मुख्यमंत्री किशोरी योजनाउद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा:ग्रामीण छात्राओं में जानकारी का अभाव

उज्जैन। सरकारी हो या प्राइवेट स्कूल, सभी की कक्षा सात से लेकर 12वीं तक की छात्राओं को स्वच्छता व सैनेटरी पैड के लिए शासन स्तर से तीन सौ रुपये हर साल मिलते हैं। यह रुपये सीधे उनके बैंक खाते में आते हैं यानी वे चाहे स्कूल से सैनेटरी पैड खरीदें या फिर बाहर दुकान से। लेकिन खास बात यह है कि अधिकतर छात्राओं को इस बात का पता ही नहीं है। शहरी क्षेत्रों में तो फिर भी ठीक ग्रामीण में तो छात्राओं को ही नहीं स्कूल प्रबंधन को ही इसकी जानकारी का अभाव सामने आ रहा है। छात्राओं को जागरूकता का मसला तो बहुत दूर की बात है। हालांकि शहर के कुछ बड़े कन्या विद्यालयों की छात्राओं को स्कूल प्रबंधन ने जागरूक किया है। इसलिए उन्हें इस बात का पता है।

शहर के दशहरा मैदान कन्या विद्यालय में लगी वेंडिग मशीन में पांच रुपये का सिक्का डालकर सैनेटरी पैड ले लेती हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों में छात्राओं को तो छोड़ो, स्कूल प्रबंधन एवं शिक्षिकाओं  तक को पता नहीं है कि सैनेटरी पैड या स्वच्छता के लिए छात्राओं को सालाना राशि शासन से सीधे उनके खाते में मिलती है।इसलिए बैंक खातों में जाते हैं रुपये-सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद स्कूलों में फंड देने की जगह सरकार ने कक्षा सात से कक्षा 12 तक की छात्राओं को उनके खाते में 300 रुपये देने का निर्णय लिया था। चूंकि वर्तमान में स्कूल में प्रवेश लेने के साथ ही हर छात्र का आधार नंबर व उनका या उनके स्वजन का बैंक खाता नंबर ले लिया जाता है। इसलिए सरकार से आने वाली राशि छात्राओं के खाते में पहुंच जाती है।

नहीं पता खाते में सालाना रू.300 आ रहे- कई ग्रामीण स्कूलों में तो शिक्षक भी इस योजना से अनभिज्ञ हैं। कक्षा 7 से 12वीं तक की छात्राओं को मासिक स्वच्छता और सैनिटरी पैड खरीदने के लिए सरकार हर वर्ष 300 रुपये की सहायता राशि देती है। यह राशि सीधे छात्राओं के बैंक खाते में भेजी जाती है। हैरानी यह है कि बड़ी संख्या में छात्राओं को इसकी जानकारी ही नहीं है। शहरों में तो फिर भी कुछ स्कूलों में छात्राएं इससे अवगत हैं लेकिन ग्रामीण स्कूलों में तो शिक्षक भी इस योजना से अनभिज्ञ हैं, जिससे इसका उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा है।

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