इन्दौर। कोर्ट की लगातार फटकार झेल रही इन्दौर पुलिस को एक बार फिर हाइकोर्ट ने ने फटकार लगाते ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति नहीं होने के सख्त निर्देश दिए हैं। मामला इन्दौर के एरोड्रम थाने में एक युवक को 43 घंटे से ज्यादा हिरासत में रखने के बाद उसकी जमानत न मानते हुए उसे जेल भेजने का है। कोर्ट ने न्यायिक हिरासत में भेजे गए युवक को बांड भरवाकर तुरंत छोड़ने के लिए भी आदेश जारी किए।
हाइकोर्ट में एडवोकेट केपी गणगौरे द्वारा कस्तूराबाई जाटवा की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर मध्यप्रदेशउच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस अल्पेश वाय कोगजे और विनय सराफ की युगलपीठ ने सुनवाई उपरांत पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिए जाएं। कि मामले की जांच एसीपी या उससे वरिष्ठ स्तर के अधिकारी से करवाएं। वहीं इस तरह की घटना दोबारा न हो, इसकी व्यवस्था भी की एडवोकेट केपी गणगौरे के अनुसार कस्तूराबाई जाटवा की ओर से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर कोर्ट को बताया गया कि उनका पुत्र अभय उर्फबालकदास जो फिलहाल इंदौर में रह रहा है, वो 9 अक्टूबर की शाम अंबिका नगर में अपनी महिला मित्र से मिलने जा रहा
था। रास्ते में जयदीप दुबे नामक व्यक्ति ने गाड़ी खड़ी कर रखी थी। गाड़ी हटाने को कहा तो विवाद हो गया। इसके बाद दोनों पक्ष एरोड्रम थाना पहुंचे। 6 शाम बजे बालकदास को पुलिस ने थाने में बैठा लिया तथा इसके बाद बालकदास के भाई जब थाने पहुंचे तो उन्हें भी थाने में बैठा लिया। उन्हें 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया। इसके बाद 11 अक्टूबर को बालकदास के खिलाफ एक नई घटना के तहत मुकदमा दर्ज कर कहा गया कि 11 अक्टूबर को वो दोपहर 1.30 बजे के लगभग एयरपोर्ट रोड स्थित शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के बाहर लोगों को रोक कर गाली-गलौच कर रहा था तथा इस मामले में उसे एसीपी के समक्ष पेश किया जिसमें एसीपी ने जमानत ये कहते हुए नामंजूर कर दी कि वे सांवर में रहते हैं और उसे समय पर पेश नहीं कर पाएंगे। उससे 25-25 हजार रुपए की दो स्थानीय लोगों की जमानत पेश करने को कहा और नहीं देने पर जेल भेज दिया। आदेश में लिखा था कि जमानत नहीं देने के चलते जेल भेजा जाए। इसे ही कोर्ट में याचिका दायर करते हुए चुनौती दी गई थी। जिस पर कोर्ट ने सुनवाई उपरांत इन्दौर पुलिस को फटकार लगाते उक्त निर्णय दिया।