इंदौर। शहर के लसूड़िया और विजय नगर क्षेत्र समेत कई इलाकों में बड़े-बड़े क्लब और पब रात 12 बजे तक गुलजार रहते हैं। रोशनी, म्यूजिक और पार्टियों की चकाचौंध के बीच ग्राहकों को लुभाने के लिए खाने-पीने के भी लंबे-चौड़े मेन्यू परोसे जाते हैं। लेकिन अब सवाल क्लबों की चमक-दमक से निकलकर उनकी रसोई तक पहुंच गया है—आखिर इन क्लबों में ग्राहकों की प्लेट तक पहुंच रहा खाना कितना सुरक्षित है। कुछ ही दिनों पहले विजय नगर क्षेत्र स्थित नामचीन सायाजी होटल पर खाद्य विभाग ने कार्रवाई करते हुए खाद्य सामग्री की जांच की थी। अनियमितताएं सामने आने के बाद प्रशासन ने होटल को सील तक कर दिया था। हालांकि बाद में होटल फिर खुल गया, लेकिन इस कार्रवाई ने शहर के दूसरे होटल-रेस्टोरेंट संचालकों के बीच खलबली जरूर मचा दी थी। जब शहर के बड़े और नामचीन होटल खाद्य विभाग की जांच के दायरे में आ सकते हैं, तो फिर क्लबों की रसोई आखिर इससे बाहर क्यों रहें?
शहर में ऐसे कई क्लब हैं जहां रोजाना बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं और खाने-पीने पर अच्छी-खासी रकम खर्च करते हैं। ग्राहक पसंदीदा और चटपटा खाना मिलने की उम्मीद में बिल चुकाता है, लेकिन क्या उसे वही गुणवत्ता मिल रही है जिसके पैसे लिए जा रहे हैं? क्लबों की रसोई में इस्तेमाल होने वाली खाद्य सामग्री की गुणवत्ता, एक्सपायरी डेट, स्टोरेज व्यवस्था, कच्चे और पके भोजन का रखरखाव, साफ-सफाई और किचन की हाइजीन जैसे तमाम पहलुओं की जांच भी जरूरी है।
होटलों की रसोई खंगाली जा रही है तो क्लबों के किचन क्यों नहीं? यह सवाल अब इसलिए भी अहम है क्योंकि क्लबों में देर रात तक खाना परोसा जाता है और कई जगहों पर खाद्य सामग्री का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। ऐसे में सिर्फ बाहर की चमक देखकर खाने की गुणवत्ता का अंदाजा लगाना मुश्किल है। अब निगाहें खाद्य विभाग पर हैं कि क्या विभाग शहर के नामचीन क्लबों की रसोई में भी दस्तक देगा या फिर क्लबों की चकाचौंध के पीछे छिपी किचन व्यवस्था जांच से दूर ही रहेगी? अगर होटल और रेस्टोरेंट की खाद्य सामग्री की जांच हो सकती है, तो क्लब भी आखिर उसी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं। ऐसे में क्लबों में परोसे जाने वाले खाने की भी नियमित जांच होनी चाहिए, ताकि ग्राहकों की जेब के साथ उनकी सेहत से भी खिलवाड़ न हो।
शहर में ऐसे कई क्लब हैं जहां रोजाना बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं और खाने-पीने पर अच्छी-खासी रकम खर्च करते हैं। ग्राहक पसंदीदा और चटपटा खाना मिलने की उम्मीद में बिल चुकाता है, लेकिन क्या उसे वही गुणवत्ता मिल रही है जिसके पैसे लिए जा रहे हैं? क्लबों की रसोई में इस्तेमाल होने वाली खाद्य सामग्री की गुणवत्ता, एक्सपायरी डेट, स्टोरेज व्यवस्था, कच्चे और पके भोजन का रखरखाव, साफ-सफाई और किचन की हाइजीन जैसे तमाम पहलुओं की जांच भी जरूरी है।
होटलों की रसोई खंगाली जा रही है तो क्लबों के किचन क्यों नहीं? यह सवाल अब इसलिए भी अहम है क्योंकि क्लबों में देर रात तक खाना परोसा जाता है और कई जगहों पर खाद्य सामग्री का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। ऐसे में सिर्फ बाहर की चमक देखकर खाने की गुणवत्ता का अंदाजा लगाना मुश्किल है। अब निगाहें खाद्य विभाग पर हैं कि क्या विभाग शहर के नामचीन क्लबों की रसोई में भी दस्तक देगा या फिर क्लबों की चकाचौंध के पीछे छिपी किचन व्यवस्था जांच से दूर ही रहेगी? अगर होटल और रेस्टोरेंट की खाद्य सामग्री की जांच हो सकती है, तो क्लब भी आखिर उसी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं। ऐसे में क्लबों में परोसे जाने वाले खाने की भी नियमित जांच होनी चाहिए, ताकि ग्राहकों की जेब के साथ उनकी सेहत से भी खिलवाड़ न हो।