इंदौर। मध्यप्रदेश भाजपा अब सिर्फ चुनाव के समय सक्रिय होने के बजाय कमजोर विधानसभा क्षेत्रों में संगठन की पकड़ लगातार मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी ने वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में हारी 66 सीटों के अलावा पांच हजार से कम मतों के अंतर से जीती सीटों को भी निगरानी के दायरे में रखा है। इन क्षेत्रों के लिए अलग-अलग संगठनात्मक रणनीति तैयार की जा रही है।प्रदेश भाजपा के नए प्रभारी बिप्लब कुमार देव के अगले प्रवास को इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक विदेश प्रवास से लौटने के बाद देव नवरात्रि में मध्यप्रदेश आएंगे और कमजोर क्षेत्रों में संगठन की स्थिति का सीधे जायजा ले सकते हैं। उनका फोकस भोपाल में बैठकों के बजाय क्षेत्रीय प्रवास और स्थानीय कार्यकर्ताओं से संवाद पर रहेगा।
संगठनात्मक बैठकों में विधानसभा क्षेत्रों की स्थिति पर मंथन किया गया-, जहां भाजपा चुनाव हार गई थी या बेहद कम अंतर से जीत हासिल कर सकी थी। अब इन क्षेत्रों में केवल चुनावी समीकरण नहीं, बल्कि बूथ स्तर के संगठन, स्थानीय नेतृत्व, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और जनता से संपर्क की स्थिति का आकलन किया जाएगा। पार्टी स्तर पर माना जा रहा है कि कमजोर सीटों पर एक जैसी रणनीति लागू करने के बजाय क्षेत्रवार समस्याओं के आधार पर अलग प्लान तैयार करना होगा। इसके लिए स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं से फीडबैक लिया जाएगा।
गुटबाजी वाले क्षेत्रों की बनेगी अलग रिपोर्ट-संगठन के सामने एक बड़ी चुनौती स्थानीय नेताओं के बीच आपसी खींचतान की भी है। सूत्रों के मुताबिक प्रदेश प्रभारी ने ऐसे नेताओं की क्षेत्रवार सूची मांगी है, जिनके बीच वर्चस्व को लेकर मतभेद हैं। इन नेताओं से अलग-अलग स्तर पर चर्चा कर विवाद सुलझाने की कोशिश की जाएगी।
हर दो माह में मोर्चा-प्रकोष्ठों की समीक्षा-भाजपा के मोर्चा और प्रकोष्ठों की गतिविधियों की भी नियमित समीक्षा की जाएगी। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत करीब हर दो महीने में इनके कामकाज का आकलन होगा। पार्टी का जोर यह सुनिश्चित करने पर है कि संगठनात्मक गतिविधियां केवल चुनाव के समय तक सीमित न रहें और अलग-अलग मोर्चों के पदाधिकारी लगातार जनता के बीच सक्रिय रहें।
कोर ग्रुप में भी बदलाव की तैयारी-नवरात्रि के दौरान प्रदेश भाजपा के कोर ग्रुप में विस्तार या फेरबदल की संभावना भी जताई जा रही है। इसमें कुछ मौजूदा सदस्यों को हटाकर नए चेहरों को शामिल किया जा सकता है। चुनावी रणनीति, संगठनात्मक अनुभव और प्रशासनिक मामलों की समझ रखने वाले नेताओं को इसमें स्थान दिए जाने की चर्चा है। कुल मिलाकर भाजपा की नई कवायद का जोर कमजोर सीटों की पहचान से आगे बढकर वहां संगठन की वास्तविक स्थिति सुधारने पर है। पार्टी अगले निकाय और त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों से पहले क्षेत्रीय फीडबैक के आधार पर अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने की तैयारी में है।