पिता को मिली जमानत, जेल से बाहर आया मासूम

उज्जैन। पत्नी की आत्महत्या के मामले में जेल भेजे गये पति के साथ चार साल का मासूम भी पिता के साथ रहने की जिद पर भैरवगढ़ जेल भेजा गया था।  39 दिन बाद पिता को जमानत मिली तो मासूम भी जेल से बाहर आ गया।
नागझिरी थाना क्षेत्र में रहने वाली महिला ने अप्रैल माह में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। पुलिस ने जांच के बाद मामले में पति के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया और पति को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया। जहां से पति को न्यायिक हिरासत में जेल भेजने के आदेश जारी हो गये। पिता के साथ 4 साल का मासूम भी कोर्ट पहुंचा था। उसने पिता के साथ जेल जाने की जिद पकड़ ली। पिता-पुत्र के बीच काफी स्नेह था। मासूम की जिद देखकर न्यायाधीश ने उसे भी जेल भेजने के आदेश दिये और जेल प्रशासन को निर्देशित किया गया कि मासूम की पूरी देखभाल की जाये। अधिवक्ता विकास दुबे ने बताया कि पिता के साथ जेल गये मासूम को लेकर उनके द्वारा पिता की जमानत याचिका न्यायालय में प्रस्तुत की। करीब 38 दिनों बाद पिता की जमानत याचिका न्यायालय द्वारा मंजूर कर ली गई और रिहाई के आदेश जारी किये गये। पिता को जमानत मिलते ही मासूम भी जेल से बाहर आ गया।
अधिवक्ताओं और जेल प्रशासन हुआ भावुक
पत्नी की आत्महत्या मामले में जेल भेजे गये पति की जमानत मंजूर होते ही पिता के साथ जेल में रह रहे मासूम को लेने अधिवक्ता विकास दुबे के साथ अधिवक्ता प्रवीणसिंह चौहान, विकास गोमे, अजय राजसिंह राठौर और भूपेन्द्रसिंह चौहान केन्द्रीय जेल भैरवगढ़ पहुंचे थे। इस दौरान पिता से पहले मासूम उछलता-कूदा जेल से बाहर आया। यह देख जेल विभाग के साथ अन्य बंदी भी भावुक हो गये। बातचीत के दौरान मासूम से सवाल किया गया कि वापस जेल जाना चाहोगें तो उसने मासूमियत से जवाब दिया कि नहीं अब घर जाऊंगा।
जेल में मिलता था अलग भोजन
चार साल के मासूम ने बताया कि उसे जेल में अलग से खाना मिलता था, जिसमें पराठे और अन्य खाने की चीजे आती थी। अधिवक्ता विकास दुबे ने बताया कि हालांकि कानून की प्रक्रिया अपने निर्धारित मार्ग पर चलती है। लेकिन इस मासूम की मुस्कान और अपने पिता के प्रति उसका लगाव यह दर्शाता है कि हर मुकदमे के पीछे मानवीय भावनाएं भी होती है। पिता और मासूम की रिहाई का दृश्य ऐसा अनुभव बन गया, जिसकी कीमत रूपयों से भी अधिक थी।

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