खुसूर-फुसूर
हादसे के बाद भी नहीं आई गंभीरता…
हमारी आदत है कि हम सांप निकलने के बाद लाठी पीटते हैं। वो भी मसानिया संकल्प के साथ। वक्त के साथ संकल्प गायब हो जाता है। नीमच के पास मधुमक्खियों के हादसे में कंचनबाई बच्चों को बचाने में शहीद हो गई । इस हादसे ने यह तय किया था कि आंगनवाडी,प्राथमिक एवं अन्य विद्यालय भवनों के पास वृक्षों पर मधुमक्खियों के छत्ते खतरे की घंटी बजा रहे हैं। इनसे कभी भी हादसा होना संभावित है। इस घटना से भी हमने सबक नहीं लिया है। अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में आंगनवाडी,प्राथमिक,माध्यमिक के साथ अनेक ऐसे स्थलों के आसपास वृक्षों पर मधुमक्खियों के बडे –बडे छत्ते लटक रहे हैं। गर्मी के दिनों में छत्तों में गर्माहट के चलते ये टपकते हैं और गिरते हैं ऐसे में इनसे मधुमक्खियां भी जमकर उडती है। पुराने समय में तो गर्मी के दो –तीन माह बच्चों की छुट्टी होती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। पूरे अप्रेल माह में स्कूल लगेंगे। मात्र मई-आधा जून छु्टियां रहेगी। इसे जानते एवं देखते हुए भी न तो इस मामले में जिम्मेदार विभागीय के जिला, संभागीय एवं प्रदेश स्तरीय अधिकारी ही तत्काल ही इस मामले में सुरक्षात्मक कदम उठाने के लिए तैयार हैं। मात्र नीमच ही नहीं आसपास के जिलों में भी अनेक स्थानों पर ऐसे हाल अब भी कायम हैं। इसे लेकर ग्रामीणजनों एवं पालकों को भी नजरअंदाज किया जा रहा है। खुसूर-फुसूर है कि हादसों में आमजन को प्रभावित होना पडता है। उनका परिवार इससे प्रभावित होता है और उन्हें असमय ही कई ऐसे दु:खों से जुझना पडता है जो संभवत: उनके लिए नहीं थे। कई छोटे मोटे हादसे तो मात्र कर्मचारियों,अधिकारियों की नजरअंदाजी एवं लापरवाही से ही हो रहे हैं। इस व्यवस्था में सुधार तब तक नहीं हो सकता जब तक सांप निकल जाने के बाद लाठी पिटने की मानसिकता को त्यागा नहीं जाएगा।