उज्जैन। परिवहन विभाग ने बसों में किराया करीब 37% तक बढ़ा दिया है। फैसले से बस संचालकों की चांदी हो गई, लेकिन रोज सफर करने वाले यात्रियों की जेब सपाट हल्की हो रही है। बस संचालक भी हौले –हौले ही सही यह मान रहे हैं कि इतनी बढ़ोतरी की जरूरत नहीं थी। किराया वृद्धि के साथ ही मोटरयान अधिनियम में सुविधा का जिक्र है लेकिन जमीन पर यह सुविधा नहीं मिल रही है।बसों में नियमों के पालन को लेकर हमेशा से ही विवाद की स्थिति रही है। न तो बसों में टिकिट ही दिया जा रहा है और न ही परिवहन विभाग के समय –समय पर जारी होने वाले नियमों का ही पालन हो रहा है। मात्र सवारियों से यात्री किराया वसूली ही सीधे तौर पर हो रही है। इस बेतहाशा किराया वृद्धि को लेकर प्रतिदिन यात्रा करने वाले यात्री सवाल उठा रहे हैं कि क्या मध्यप्रदेश मोटरयान नियम 1994 और केंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम 1988 के प्रावधानों के तहत किराया बढ़ाने से पहले यात्री सुविधा को भी देखना जरूरी नहीं था।क्या कहता है नियम-कानूनकेंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम 1988 – धारा 67 कहती है कि राज्य सरकार को रूट पर बसों का किराया तय करने का अधिकार है। लेकिन किराया तय करते समय ईंधन की कीमत, परिचालन लागत, यात्रियों की क्रय शक्ति और सेवा की गुणवत्ता को ध्यान में रखने का प्रावधान है। इसी प्रकार मध्यप्रदेश मोटरयान नियम 1994 में नियम 100 से 103 कहता है कि राज्य परिवहन प्राधिकरण किराया तय करने से पहले जनसुनवाई और आपत्ति ले सकता है। नियमों में साफ है कि किराया वृद्धि के साथ बस की फिटनेस, सफाई, समयबद्धता और यात्री सुविधाओं का आकलन जरूरी है। यात्रियों का कहना है कि इस बार 37 फीसदी वृद्धि एकमुश्त की गई। न कोई सार्वजनिक चर्चा हुई, न सुविधा बढ़ाने का रोडमैप दिया गया।धीरे से ही सही मान रहे ज्यादा है-यात्री किराया वृद्धि को लेकर तर्क दिया जा रहा है कि डीजल 12 प्रतिशत और टोल-बीमा महंगा होने से किराया बढ़ाना पड़ा। इधर संचालकों से चर्चा में अधिकांश तो इसे सही मान रहे हैं पर कुछ ने धीरे से ही सही यह माना कि “हमारी लागत 15-18 फीसदी बढ़ी है। कुछ समय से हमें इसमें घाटा हो रहा था। 25 फीसदी से ज्यादा बढ़ाने की जरूरत नहीं थी। 37 फीसदी किराया वृद्धि से सीधे यात्रियों की जेब पर असर होगा। एक संचालक ने उदाहरण देते हुए कहा कि इंदौर का किराया 75 रूपए था उसे वह एक सौ रूपए तक वृद्धि ठीक थी लेकिन अब सीधे 110 रूपए की किराया वसूली की जा रही है वो भी यह कहकर की वृद्धि के मान से 116 रूपए होते हैं पर 110 लिए जा रहे हैं।यात्रियों का कहना है कि नियमों में सुविधा का जिक्र है, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं बदला।नियम का पालन नहीं-बसों में न तो चालक और न ही परिचालक वर्दी पहन रहे हैं। ऐसे में किसी दुर्घटना की स्थिति में ये सिरे से गायब हो जाते हैं। यही नहीं बसों में सीसी टीवी बंद हैं। यात्री के लिए सीटों पर लगे अलार्म स्वीच बंद हैं। बसों में सीटों की स्थिति भी आरामदायक नहीं कही जा सकती है। बस में यात्री पासिंग की स्थिति अलग है और सीट के मान से यात्री संख्या अलग बयां हो रही है। यात्री किराया सूची का डिस्प्ले नहीं किया जा रहा है। अब भी इंदौर –उज्जैन की बसों में यात्रियों को खडा कर लाने-ले जाने की स्थिति कायम है जिसे ओव्हर लोड कहा जाता है।ये किया जा सकता था-
वर्षों से अप-डाउन कर रहे यात्रियों का कहना है कि इस किराया वृद्धि का असर कभी कभार यात्रा करने वालों को इतना नहीं होगा जितना अप-डाउन वालों को होगा। अब उनसे सीधे एक सौ रूपए इंदौर के लिए जा रहे हैं। ऐसे में मासिक रूप से यह खर्च 5 हजार पर जा पहुंचा है जो पूर्व में तीन हजार 500 के लगभग था। परिवहन के जानकारों का कहना है कि किराया उचित और युक्तियुक्त तय होना चाहिए। किराया चरणबद्ध वृद्धि किया जाना था। सीधे 37फीसदी की जगह दो बार में बढ़ाते, इसे यात्री सुविधाओं से जोडते जिसमें नई बसें, सहित अन्य यात्री सुविधाओं को भी प्राथमिकता देना चाहिए था। इससे संचालकों में सुविधाओं को लेकर रूझान की स्थिति बनती। अभी तो जो है जैसा है वैसे में ही किराया बढने पर यात्रियों की सुविधा धरातल पर गौंण दिखाई दे रही है।