सेवाज्ञ संस्थानम की छठवी युवा धर्म संसद में शामिल हुए देश के 25 राज्यों से आए 1600 से अधिक युवा हमारे संस्कारों में धर्म इतना गहरा कि कर्त्तव्य हमें धर्म की और ले जाता है-भागवत -संघ सुप्रीमों ने युवाओं से संवाद की भाषा में शास्त्रोक्त उदृत श्लोकों,कथानकों एवं महाभारत सहित अन्य द्ष्टांत से समझाया

 

उज्जैन। छठवी युवा धर्म संसद का आयोजन शुक्रवार को यहां गीता भवन में किया गया। निर्धारित समय से करीब 2 घंटे विलंब से शुरू हुए सम्मेलन का आयोजन सेवाज्ञ संस्थानम के तत्वावधान में आयोजित किया गया। सम्मेलन के उद्धाटन सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक डॉ. मोहन राव भागवत ने कहा कि भारत के संस्कारों में धर्म इतना गहरा है कि हम चाहे कुछ भी कहें, हमारा कर्तव्य हमें धर्म की ओर ले जाता है। इसलिए भारत के युवाओं को शक्तिशाली, विद्यावान और धनवान बनना चाहिए, लेकिन शक्ति का उपयोग दूसरों को दबाने के लिए नहीं, बल्कि समाज और विश्व के कल्याण के लिए होना चाहिए।उन्होंने युवाओं को अपने संबोधन में शास्त्रोक्त उदृत श्लोकों,कथानकों एवं महाभारत सहित अन्य द्ष्टांत बीच-बीच में देकर समझाते हुए कहा कि यदि धर्म बुद्धि है तो शक्ति का उपयोग ज्ञान और कल्याण के लिए होगा। यदि अधर्म बुद्धि है तो विद्या विवाद के लिए, धन अहंकार के लिए और शक्ति दुर्बलों को दबाने के लिए इस्तेमाल होगी।उन्होंने कहा कि धर्म मनुष्य में शील पैदा करता है। भारत के युवाओं का जीवन भारत के जीवन को बनाने वाला धर्म बने। भारत के युवा भौतिक और आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में उन्नति करें। वे पूरे विश्व में यशस्वी बनें, लेकिन केवल यशस्वी नहीं—सार्थक भी बनें। धर्म का व्यवहारिक रूप,धर्म केवल बड़े-बड़े सिद्धांतों की बात नहीं है। हम कुछ खाते हैं और वहां कचरा नहीं करते—यह भी धर्म है। हम यातायात के नियमों का पालन करते हैं—यह भी धर्म है। हमने अपनी प्रकृति और परंपरा के अनुसार जो उपासना चुनी है, उसमें निष्ठावान रहते हैं और दूसरों की उपासना का भी सम्मान करते हैं—यह भी धर्म है। (संघ प्रमुख का युवा संवाद पेज नं.12 पर शब्दश: पढें)जीवन में धर्म होगा तो सार्थकता और समाधान रहेगा। करोड़ों रुपये कमाकर भी व्यक्ति असंतुष्ट रह सकता है, लेकिन धर्मपूर्ण जीवन जीने वाला व्यक्ति समाज के लिए प्रेरणा बन सकता है। भारत के युवाओं का जीवन ऐसा हो कि जिससे पूरा विश्व प्रेरणा ले।युवाओं को परंपरा,ज्ञान,जीवन मुल्यों से जोडना-कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। युवा धर्म संसद को संबोधित करते हुए आचार्य मिथिलेशानंद शरण महाराज ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा और धर्म के सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भ में समझना आवश्यक है। युवा धर्म संसद का उद्देश्य युवाओं को अपनी परंपरा, ज्ञान और जीवन-मूल्यों से जोड़ना है। इस पवित्र भूमि में सेवाग्य संस्थानम के संकल्प का स्वरूप युवा धर्म संसद के छठवें संस्करण के रूप में उपस्थित है।’धर्ममूर्ति’ जैसे शब्द का किसी अन्य भाषा में पूर्ण अनुवाद संभव नहींप्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने अपने संबोधन में कहा कि रामायण में ‘धर्ममूर्ति’ जैसे शब्द का किसी अन्य भाषा में पूर्ण अनुवाद संभव नहीं है। इसका अनुभव किया जा सकता है। इसी प्रकार ‘आत्मवान’ का भी केवल अनुवाद नहीं किया जा सकता, उसका अनुभव किया जा सकता है। युवा धर्म संसद में ‘इंडिया से भारत’ की ओर जाने और युवाओं को भारत की ज्ञान परंपरा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। यदि भारत के युवा आत्मवान बनेंगे तो यही हमारे लिए बहुत बड़ा लाभ होगा। यही वास्तविक भारतीय युवा होंगे।स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण को केंद्र में रखकर आयोजन-अंत में संस्था के आशीष कुमार आशु ने आभार प्रदर्शन करते हुए कहा कि स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक शिकागो भाषण को केंद्र में रखकर यह आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 से शुरू हुआ यह राष्ट्रीय उपक्रम युवाओं में कर्तव्यपरायणता की दिशा में एक वैचारिक यात्रा के रूप में आगे बढ़ रहा है। सेवाग्य संस्थानम की देश के 13 राज्यों में इकाइयां हैं तथा देशभर से युवाओं को आमंत्रित किया जाता है। इस आयोजन में लगभग 25 राज्यों से  युवा प्रतिभागियों के शामिल हुए हैं । तीन दिनों तक चलने वाली युवा धर्म संसद में व्याख्यान, संवाद, जिज्ञासा-समाधान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के विभिन्न सत्र आयोजित होंगे। प्रतिभागियों को विभिन्न विषयों पर बातचीत और अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त करने का अवसर मिलेगा।धर्म संसद में डा. भागवत का शब्द: संबोधन जब मैंने सुना कि ‘युवा धर्म संसद’ है तो आनंद हुआ, क्योंकि धर्म का विचार युवा करते हैं—यह बात आजकल सुनाई ही नहीं देती। धर्म की बात करें तो लोग कहते हैं कि यह बुढ़ापे की बात है।धर्म अस्तित्व के प्रारंभ से अस्तित्व के अंत तक रहता है और उसी के अनुसार सारी बातें चलती हैं। आप उसको मानो या मत मानो। दुनिया में ऐसी बातें हैं जिन्हें हम मानें या न मानें, वे अपने नियम से चलती हैं। सूर्य है, उसका उदय और अस्त निश्चित है।उद्घाटन का भाषण करना था तो मेरे मन में एक विचार आया। मैंने एक किस्सा सुना था। कठिनाई में फंसे एक व्यक्ति से पूछा गया कि धर्म के बारे में बोलोगे? उसने कहा—मैं धर्म का जानकार नहीं हूं, अधिकारी तो स्वामी जी हैं।धर्म को समझने के लिए पहले से बनी धारणाओं को कुछ समय के लिए अलग रखना पड़ता है। जैसे कोई व्यक्ति ज्ञान पाने के लिए गुरु के पास गया। गुरु ने चाय का कप लिया और उसमें चाय डालते रहे। कप भर गया, चाय बाहर गिरने लगी। व्यक्ति ने कहा—कप तो भर गया। गुरु ने कहा—तुम भी ऐसे ही भरे हुए हो। पहले खाली हो जाओ, फिर कुछ नया ग्रहण कर पाओगे।मैं यह नहीं कह रहा कि आप अपना मन खाली कर लें और फिर मैं बताऊंगा। अहंकार मेरा नहीं है। लेकिन धर्म को समझना है तो यह समझना होगा कि सृष्टि के अस्तित्व से धर्म है और सृष्टि के विलय तक रहेगा।महाभारत में भगवद्गीता है। उसमें कर्तव्य का उपदेश है, कर्मयोग का उपदेश है। महाभारत के अंत में पांच श्लोक हैं, जिन्हें ‘भारत सावित्री’ कहा जाता है।व्यास महर्षि कहते हैं कि जीवन में हम अनेक संबंध बनाते हैं—माता-पिता, पुत्र-पुत्री, मित्र और अन्य संबंध। ये संबंध बनते हैं और देह के समाप्त होने के साथ समाप्त हो जाते हैं। जीवन में आनंद के क्षण भी होते हैं और दुख के भी। लेकिन जो जानकार है, वह इनके चक्कर में नहीं फंसता।व्यास महर्षि कहते हैं कि जीवन में जिस भौतिक सुख की तुम अपेक्षा करते हो, अर्थ और काम की अपेक्षा करते हो, वह धर्म से प्राप्त होता है। इसलिए धर्म का सेवन करो।अपनी किसी इच्छा की पूर्ति के लिए, भय के कारण, लोभ के कारण या प्राण बचाने के लिए भी धर्म का त्याग मत करो। सुख-दुख आते-जाते हैं, धर्म नित्य रहता है।धर्म क्या है?ऐसा क्यों लगता है कि धर्म बुढ़ों के लिए है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि धर्म शब्द का अर्थ ही हमें पता नहीं है।हम धर्म को ‘रिलीजन’ कहने लगे हैं। रिलीजन धर्म नहीं है।धर्म का संबंध ‘धारण’ से है। जो धारण करता है, वही धर्म है। धर्म वह है जो विश्व को धारण करता है, उसे टूटने और बिखरने नहीं देता।पानी का धर्म बहना है, आग का धर्म जलाना है।

 

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