इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इंदौर मेट्रो परियोजना के लिए 150 से अधिक पेड़ काटे जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका का निपटारा करते हुए पेड़ों की कटाई को लेकर कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए। हाईकोर्ट ने परियोजना के लिए पेड़ काटने पर रोक लगाने से इनकार किया, लेकिन स्पष्ट किया कि सभी पेड़ एक साथ या मनमाने तरीके से नहीं काटे जाएंगे। कटाई और शाखाओं की छंटाई कम से कम दो पक्षी विशेषज्ञों की निगरानी और सलाह से चरणबद्ध तरीके से करनी होगी, ताकि वहां आने वाले पक्षियों को कम से कम परेशानी हो। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ ने निर्देश दिया कि पक्षी विशेषज्ञ पेड़ों पर मौजूद घोंसलों, अंडों और उनके भीतर पल रहे बच्चों का विशेष ध्यान रखेंगे। पेड़ों की कटाई या शाखाओं की छंटाई के दौरान वन्यजीव बचाव दल भी मौके पर मौजूद रहेगा। उसके पास जाल और चिकित्सा किट होनी चाहिए, ताकि घायल पक्षियों और घोंसलों से गिरने वाले बच्चों की मदद की जा सके। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि सभी पेड़ एक साथ काट दिए गए, तो पक्षियों को अत्यधिक तनाव और परेशानी हो सकती है, जिससे उबरना उनके लिए मुश्किल हो सकता है। इसके बजाय धीरे-धीरे और व्यवस्थित तरीके से पेड़ों की कटाई तथा शाखाओं की छंटाई की जाए, ताकि पक्षियों को आसपास के दूसरे पेड़ों पर अपना ठिकाना बनाने का समय मिल सके।
अदालत ने निर्देश दिया कि यदि आसपास पर्याप्त जगह उपलब्ध है, तो वहां उसी प्रकार के पेड़ लगाए जाएं, ताकि मेट्रो परियोजना पूरी होने तक पक्षियों को दोबारा बसेरा मिल सके। मेट्रो निगम ने अदालत को बताया था कि परियोजना के लिए काटे जाने वाले पेड़ों की भरपाई के तौर पर ढाई हजार पेड़ लगाए जाएंगे।
हाईकोर्ट ने निगम को इस आश्वासन का पालन करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि पौधारोपण के संबंध में एक वर्ष के भीतर रिपोर्ट हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में जमा की जाए। साथ ही, लगाए गए पेड़ों की आगामी वर्षों में देखभाल सुनिश्चित की जाए। इस संबंध में हर साल अप्रैल में रिपोर्ट और गूगल से प्राप्त तस्वीरें भी रजिस्ट्री में दाखिल करनी होंगी।
पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि पक्षी विशेषज्ञों की सेवाओं के लिए राज्य सरकार प्रत्येक विशेषज्ञ को 10 हजार रुपये का पारिश्रमिक दे। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि इंदौर मेट्रो परियोजना के लिए 150 से अधिक पेड़ों को काटना पड़ सकता है। इससे करीब एक हजार पक्षियों के घोंसले नष्ट होने की आशंका है। याचिकाकर्ता के अनुसार ये पेड़ शहर में उन पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण ठिकाना हैं।
नेचर वॉलंटियर्स सोसाइटी भी इस जनहित याचिका में हस्तक्षेपकर्ता के रूप में शामिल हुई।
याचिका पर सुनवाई से पहले हाईकोर्ट ने 29 सितंबर, 2026 को दोनों पक्षों और उनके वकीलों के साथ संबंधित स्थल का निरीक्षण किया था। अदालत ने रेल निगम को आसपास की ऐसी वैकल्पिक जमीनों से संबंधित योजनाएं भी पेश करने का निर्देश दिया था, जिन्हें भूमिगत मेट्रो स्टेशन के निर्माण के लिए अधिग्रहित किया जा सकता था। याचिकाकर्ता के वकील ने यह सवाल भी उठाया कि पलासिया से रेलवे स्टेशन तक मेट्रो का मार्ग सीधा होने के बजाय घुमावदार क्यों है और इसके पीछे क्या कारण हैं।
मेट्रो निगम की ओर से अदालत को बताया गया कि परियोजना की योजना बनाते समय क्षेत्र में पक्षियों के बसेरे की जानकारी थी और मार्ग का निर्धारण निर्माण से जुड़ी विभिन्न परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया गय। निगम ने कहा कि मेट्रो स्टेशन को दूसरी जगह स्थानांतरित करना संभव नहीं है क्योंकि वहां कोई खाली जमीन उपलब्ध नहीं है। निगम ने यह भी कहा कि पेड़ों की कटाई के लिए वन विभाग से आवश्यक अनुमति ली गई है और निर्माण से वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के प्रावधानों का उल्लंघन नहीं होगा।
उसके अनुसार मेट्रो स्टेशन के मार्ग और स्थान का मुद्दा पहले भी एक अन्य याचिका में उठाया गया जिसे हाईकोर्ट की समकक्ष पीठ ने खारिज किया था।
हाईकोर्ट ने पूर्व में दिए गए फैसले राज लक्ष्मी फाउंडेशन बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य का उल्लेख किया। यह मामला वर्ष 2024 की रिट याचिका संख्या 10909 से संबंधित था। पीठ ने कहा कि पहले के फैसले को देखते हुए इस मामले में परियोजना के संबंध में हस्तक्षेप करना समकक्ष पीठ के आदेश का अतिक्रमण करने जैसा होगा। इसलिए पेड़ों की कटाई रोकने के लिए हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
हालांकि, अदालत ने क्षेत्र में बड़ी संख्या में आने वाले पक्षियों के हितों को ध्यान में रखते हुए विशेष निर्देश जारी किए। पीठ ने कहा कि वहां आने वाले अधिकतर पक्षी रात में ठहरने के लिए आते हैं जबकि कुछ पक्षियों ने पेड़ों पर घोंसले भी बनाए हैं। अदालत ने पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरणविद् और हस्तक्षेपकर्ता भालचंद्र मोंढे को भी निर्देश दिया कि वे ऐसे उपाय सुझाएं, जिनसे पक्षियों को कम से कम परेशानी के साथ आसपास के दूसरे पेड़ों पर जाने के लिए पर्याप्त समय मिल सके। इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने जनहित याचिका का निपटारा किया।