खुसूर-फुसूर हाल –ए- हालिया आयोजन

खुसूर-फुसूर

हाल –ए- हालिया आयोजन

हाल ही में धर्मनगरी में एक आयोजन का प्रबंधन किया गया। इसे मूलत: प्रशासनिक भाषा में भीड प्रबंधन से संबोधित किया जाता है। वैसे यह श्रद्धालुओं से संबंधित है। इस आयोजन की व्यवस्था में वैसे तो जिला के तकरीबन सभी विभागों का उपयोग होता है लेकिन प्रमुख विभागों को छोडकर शेष को दोयम दर्जे का समझा गया। तिमारदारी से संबंधित सेवा,सुश्रुषा करने वाले विभाग के करीब 10 दर्जन से ज्यादा कर्मचारी एवं तिमारदारी अधिकारियों को पास ही नहीं दिए गए। ये अकेला विभाग नहीं था और भी कुछ विभाग के अधिकारी भी इससे पिडित रहे हैं। इसके चलते कई स्थानों पर इनके पहुंचने में ही परेशानी रही और वर्दी में तैनात सुरक्षा वालों के लिए भी इन्हें जाने देने और नहीं जाने देने का प्रश्न बार-बार खडा होता रहा,जिससे तर्क कुतर्क के हाल कायम होते रहे और निदान निकलते रहे। वीआइपी प्रवेश द्वार के यहीं पर अव्यवस्थाओं का आलम कायम होता रहा जिसे व्यवस्थित करने में किसी की कोई रूचि नहीं रही। आयोजन के कागजी योजना को अंजाम देने और विभागवार कागज पर काम के आदेश देने की बजाय मौखिक दंड अधिकारी का काम किया गया। जिस काम को मंदिर के कर्मचारी अंजाम दे रहे हैं और शासन के विभागों को उससे दूर कर दिया गया है उन्ही कामों के लिए विभागों के कर्मचारी हासिए पर रहे। बेरिकेडिंग में चौडाई की व्यवस्था की गई लेकिन कुछ –कुछ दूरी पर रोक की कोई व्यवस्था नहीं होने से भीड का दबाव बनने की स्थिति बनी,जबकि बेरिकेडिंग में कुछ –कुछ दूरी पर बेरियर किए जाना इस प्रकार की व्यवस्था में जरूरी था । बेरिकेडिंग के हर ब्रेकेट की जिम्मेदारी के लिए कुछ वर्दी एवं एक –दो दंडाधिकारी तैनात किए जाने थे जिससे बराबर व्यवस्था पर नजर बनी रहती एवं कुछ समस्या होने पर संबंधित ब्रेकेट तक ही सिमित रहती । बेरिकेडिंग की व्यवस्था कतार की बजाय भीड का एक बहाव चलाया गया इससे भी समस्या की स्थिति बनी और ब्लाक लगने का कारण बना। इसमें वहीं हाल बनते बिगडते गए जैसे पतंग की डोर जरूरत से ज्यादा निकाल ली जाए तो उसमें उलझन पैदा होकर गठान लग जाती है। खुसूर –फुसूर है कि करीब दो किलोमीटर की बेरिकेडिंग व्यवस्था बेरियर विहीन उपयोग की जाना और उसमें भीड प्रबंधन मतलब सीधे तौर पर यानिकी भगवान भरोसे के हाल। कागजों में कार्यादेश और विभागीय योजना कि किसे क्या-क्या काम करने हैं इसका अभाव में कर्मचारी और कई अधिकारी भी चक्कर घिन्नी होते रहे। ऐसे हाल में कुछ करो तो समस्या और कुछ न करो तो भी समस्या की स्थिति कायम हुई। कुछ भी हो बाबा की कृपा बरसी और बगैर किसी अनहोनी के सब कुछ जल की तरह कल-कल हो गया। बोलो जय श्री महाकाल।

 

 

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