1 अप्रैल से बिजली के दामों में 10 फीसदी या उससे भी अधिक वृद्धि संभव

 घाटे का हवाला देकर दरों में वृद्धि कर आम उपभोक्ताओं को महंगे बिलों का झटका देती रही है बिजली कंपनियां

उज्जैन। प्रदेश की तीनों बिजली कंपनियां घाटे का हवाला देकर दरों में वृद्धि कर आम उपभोक्ताओं को महंगे बिलों का झटका देती रही है। इस बार भी इन कंपनियों ने 6 हजार 44 करोड़ रुपए के घाटे की भरपाई के लिए आयोग के समक्ष याचिकाएं दायर की है। वैसे तो तीनों कंपनियों के घाटे का आंकड़ा 42 हजार करोड़ तक जा पहुंचा है। आयोग के पास दर्ज आपत्तियों की सुनवाई मंगलवार से शुरू हो गई है। 1 अप्रैल से बिजली के दामों में 10 फीसदी या उससे भी अधिक वृद्धि संभव है। दरअसल, बिजली कंपनियों के अनावश्यक खर्च के कारण प्रदेश में बिजली महंगी हो रही है। जानकारों का कहना है कि अगर कंपनियां अनावश्यक खर्च बंद कर दें तो बिजली 15 प्रतिशत तक सस्ती हो सकती है।

प्रदेश में बिजली दरों में प्रस्तावित बढ़ोतरी को लेकर असंतोष तेज हो गया है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए बिजली कंपनियों द्वारा 10.20 प्रतिशत टैरिफ वृद्धि के प्रस्ताव पर मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने जनसुनवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी है। मंगलवार को हुई पहली सुनवाई में पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी से जुड़े उपभोक्ताओं, विशेषज्ञों और औद्योगिक प्रतिनिधियों की आपत्तियां सुनी गई। कुल 14 आपत्तियां दर्ज हुई, जिनमें से 10 आवेदकों ने अपना पक्ष रखा और तीन लोगों ने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर आयोग के समक्ष तर्क प्रस्तुत किए। सुनवाई में सबसे प्रमुख आपत्ति एमपी जेनको के सेवानिवृत्त अतिरिक्त मुख्य अभियंता राजेंद्र अग्रवाल ने दर्ज कराई। उन्होंने आयोग को बताया कि बिजली कंपनियां यदि अपने अनावश्यक और अनियंत्रित खर्चों पर अंकुश लगाएं तो उपभोक्ताओं पर दर वृद्धि का बोझ डालने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। उनके अनुसार वित्तीय प्रबंधन में सुधार और खर्चे की युक्तिसंगत समीक्षा से बिजली दरों में 10.20 प्रतिशत वृद्धि की बजाय है। उन्होंने यह भी कहा कि हर वर्ष टैरिफ बढ़ाने की प्रवृत्ति कंपनियों की कार्यप्रणाली की कमजोरी को दर्शाती है। अग्रवाल ने स्मार्ट मीटर परियोजना पर भी गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना था कि स्मार्ट मीटर के नाम पर लगभग 820 करोड़ रुपये की वसूली का प्रस्ताव अनुचित है। उपभोक्ताओं से केवल रखरखाव और संचालन की वास्तविक लागत ही ली जानी चाहिए, न कि परियोजना निवेश का पूरा भार।

 

उन्होंने नवीकरणीय ऊर्जा की उपलब्धता के आंकड़ों पर सवाल उठाए। पारेषण क्षति के अलावा बिजली चोरी और शासन की योजनाओं के तहत किसानों-गरीबों व अन्य वर्ग को जो सस्ती या मुफ्त बिजली दी जाती है उसकी क्षतिपूर्ति भी बिजली कम्पनियां अन्य उपभोक्ताओं से करती है और यही कारण है कि भरपूर बिजली का उत्पादन होने और मांग बढऩे के बावजूद इन कम्पनियों का घाटा कम नहीं होता है। सस्ती बिजली के नाम पर चुनाव जीतने वाली भाजपा पिछले 20 सालों से बिजली के दामों में लगातार वृद्धि करती जा रही है, जिसके चलते हर श्रेणी के उपभोक्ताओं के बिजली बिल बढ़ते रहे हैं। आगामी वर्ष 2026-27 के लिए पिछले दिनों नियामक आयोग के समक्ष इंदौर सहित तीनों बिजली वितरण कंपनियों ने 10.19 फीसदी की बढ़ोतरी का प्रस्ताव नियामक आयोग को सौंपा, जिस पर अब आज से सुनवाई शुरू हो रही है। मंगलवार को पूर्वी क्षेत्र बिजली कंपनी की सुनवाई हुई। आज पश्चिमी क्षेत्र और फिर 26 फरवरी को मध्य क्षेत्र की कंपनियों की दर वृद्धि याचिका पर प्राप्त आपत्तियों की सुनवाई होगी। हालांकि गिनती की आपत्तियां ही आयोग को प्राप्त होती है। सिर्फ कुछ विशेषज्ञ और उद्योगों की तरफ से आपत्तियां लगाई जाती है, लेकिन उनका भी कोई फायदा आम उपभोक्ताओं को नहीं मिलता और शासन की कठपुतली बने आयोग द्वारा हर साल बिजली की दरें इन सुनवाई की नौटंकी करने के बाद बढ़ा दी जाती है।

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