खुसूर-फुसूर जीवदया के समय में क्रुरता…

खुसूर-फुसूर

जीवदया के समय में क्रुरता…

गर्मी के भीषण मौसम में इंसान तो जैसे तैसे बच रहा है। उसे ईश्वर प्रदत्त बौद्धिकता मिली हुई है। मूक जीवों के लिए यह दौर बहुत ही कठिन होता है। वे चाहे पशु हों या फिर पक्षी। ऐसे में भी शहरी क्षेत्रों में आवारा जानवरों के साथ क्रुरता की स्थिति बराबर बनी हुई है। दया के दौर में क्रुरता की स्थिति यह है कि जानवरों के पीने के पानी को लेकर मानव प्रबंध की स्थिति नगण्य के समान है। रहवासी क्षेत्रों में लगे हैंडपंप एवं नलकूपों के पास छोटी –मोटी होद तक नहीं है जबकि वहां से पानी भरने के दौरान काफी पानी फिजूल बहता रहता है उसके बाद भी जीवों के लिए पानी की व्यवस्था करने में किसी को कोई लगाव नहीं है। पक्षियों के लिए भी नगण्य स्थिति में ही मानव अपनी दया दिखा रहा है। इस दौरान भी श्वानों को रोटी,पानी देने की बजाय वाहनों की छांव में नाली किनारे ठंडक में बैठने पर भी भगाया जा रहा है । लाठियों से मारपीट की जा रही है। अगर आवारा मवेशी घरों के पास के वृक्षों की छांव में बैठ रहे हैं तो उन्हें भी हकाला जा रहा है। झुलसा देने वाली गर्मी के दौरान इंसान तो पंखे एवं कुलर के साथ वातानुकुलित मशीन के उपयोग से अपने आप को बचा रहा है लेकिन जानवरों की प्राकृतिक छांव को भी छीनने पर उतारू हो गया है। तमाम संस्थाओं के निवेदन के बाद भी धर्मानुगत जीवदया के उद्हरण के बाद भी शहरी क्षेत्र में गिनती के मकानों के सामने जानवरों के पीने के पानी के पात्र एवं पक्षियों के लिए पात्र इस बात का सबूत हैं कि जीव दया के नाम पर इस समाज में मात्र धर्म पुस्तकों तक ही सिमटा हुआ है। कर्म में उसे उतारने की स्थिति ही नहीं है। खुसूर-फुसूर है कि जीवदया के गिरते स्तर के कारण ही कई सारी समस्याएं जन्म ले रही है। मानव अपने साथ अन्य जीवों का सोचता तो पंचायती हैंडपंपों,नलकूपों  के जीवों के पानी के लिए होद भी निर्मित होता । घरों के बाहर एवं छतों पर जीवों के लिए पानी रखा जाता । निश्चित तौर पर इसके दुष्प्रभाव से मानव बच नहीं सकता।

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