इंदौर। नगर निगम से लेकर प्रदेश और दिल्ली तक भाजपा की सरकार, वार्ड में भाजपा की पार्षद और फिर भी विकास कार्यों में बाधा आने का दावा! वार्ड क्रमांक 66 में पार्षद कंचन गिदवानी और कांग्रेस के वार्ड अध्यक्ष बंधन शुक्ला के बीच हुए विवाद के बाद अब राजनीति के साथ-साथ क्षेत्र की समस्याएं भी चर्चा में हैं। लालबाग लाइन स्थित तेजस मंदिर पर जाली लगाने का मुद्दा इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक बार फिर सामने आया है।विवाद के बाद पार्षद कंचन गिदवानी ने पत्रकारों से चर्चा के दौरान कहा कि जब वे क्षेत्र में काम करने जाती हैं, तो उन्हें काम नहीं करने दिया जाता। पार्षद के इस बयान ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि क्षेत्र में काम करने में बाधा आ रही है, तो आखिर वह बाधा कौन पैदा कर रहा है? क्या स्थानीय स्तर पर राजनीतिक खींचतान विकास कार्यों पर भारी पड़ रही है, या इसके पीछे कोई दूसरा कारण है?
*क्या क्षेत्र के कुछ नागरिक पार्षद पर भारी हैं?* –
पार्षद के बयान के बाद सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही उठता है कि क्या क्षेत्र के कुछ नागरिक इतने प्रभावशाली हैं कि नगर निगम, प्रदेश और केंद्र में अपनी सरकार होने के बावजूद भाजपा की पार्षद अपने वार्ड में काम नहीं कर पा रही हैं? यदि पार्षद को वास्तव में काम करने से रोका जा रहा है, तो यह स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए कि बाधा कहां और किस स्तर पर आ रही है।हालांकि, पार्षद के बयान से यह अपने आप साबित नहीं होता कि किसी खास व्यक्ति या नागरिक ने विकास कार्य रोके हैं। इसके लिए संबंधित पक्षों का जवाब और घटनाक्रम के तथ्य सामने आना जरूरी है। लेकिन सत्ता पक्ष की पार्षद के इस दावे ने वार्ड की राजनीति में सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
*दस साल पहले किया था जाली लगाने का वादा?*
लालबाग लाइन स्थित के जिस मंदिर पर जाली लगाने का मुद्दा भी अब चर्चा के केंद्र में है। क्षेत्र के कुछ नागरिकों ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि वे विवाद के समय मौके पर मौजूद नहीं थे, इसलिए घटनाक्रम की प्रत्यक्ष जानकारी उन्हें नहीं है। हालांकि, उनके अनुसार, करीब दस वर्ष पहले जब कंचन गिदवानी पहली बार पार्षद बनी थीं, तब मंदिर पर जाली लगाने की बात कही गई थी। नागरिकों का कहना है कि इतने वर्षों बाद भी यह काम पूरा नहीं हुआ है।स्थानीय लोगों के मुताबिक, क्षेत्र में केवल मंदिर पर जाली लगाने का मुद्दा ही नहीं, बल्कि अन्य जनसुविधाओं से जुड़ी समस्याएं भी हैं। ऐसे में सवाल यह है कि जब एक काम को लेकर वर्षों से चर्चा होती रही, तो उसका समाधान अब तक क्यों नहीं हो सका? क्या यह मामला प्राथमिकता की कमी का है या किसी दूसरी वजह से लंबित है?