कंठाल नदी की सांसों पर जलकुंभी का पहरा, हरी चादर में कैद जीवनदायिनी

सुसनेर। कुछ समय पूर्व नवीन बस स्टेंड के पास स्थिति तालाब के बाद अब टेरर आॅफ बंगाल कही जाने वाली जलकुंभी की चपेट में नगर की जीवनदायनी कंठाल नदी चपेट में है।अब यह जलकुभी सुसनेर एवं सोयतकलां की प्यास बुझाने वाला कीटखेंडी डेम की और बढ़ रही जिससे आगामी ग्रीष्मकाल में दोनो नगर को गंभीर पेयजल संकट झेलना पड सकता है। नदी के बड़े हिस्से में फैली इस खरपतवार के कारण पानी का प्रवाह थम गया है और जल स्तर में भी गिरावट देखी जा रही है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, यदि समय रहते इसकी सफाई नहीं की गई, तो आने वाले गर्मी के दिनों में पेयजल का भारी संकट खड़ा हो सकता है।
प्रदूषण और बीमारियों का खतरा
जलकुंभी के तेजी से फैलने के कारण नदी का पानी काला और दुर्गंधयुक्त होने लगा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह पौधा पानी से आॅक्सीजन सोख लेता है, जिससे मछलियां और अन्य जलीय जीव मरने लगते हैं। इसके अलावा, स्थिर पानी मच्छरों के लिए आदर्श प्रजनन स्थल बन गया है, जिससे क्षेत्र में डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों के फैलने की आशंका बढ़ गई है।
सिंचाई और पशुपालन पर असर
नदी किनारे बसे किसान सिंचाई के लिए इसी नदी पर निर्भर हैं। जलकुंभी के कारण पंपों के पाइपों में कचरा फंस रहा है, जिससे सिंचाई कार्य प्रभावित हो रहा है। वहीं, पशुपालकों के लिए भी अपने मवेशियों को पानी पिलाना चुनौतीपूर्ण हो गया है क्योंकि प्रदूषित पानी पीने से पशुओं के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है।
प्रशासनिक उदासीनता से रोष
स्थानीय नागरिकों ने कई बार नगर परिषद को इस समस्या से अवगत कराया है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। लोगों की मांग है कि मशीनों के माध्यम से नदी की व्यापक सफाई कराई जाए ताकि पानी का प्रवाह सुचारू हो सके और जलकुंभी को किनारे पर छोड़ने के बजाय वैज्ञानिक तरीके से नष्ट किया जाए, अन्यथा यह दोबारा फैल सकती है।
थम गई पानी की रफ्तार, सड़ने लगा जल
कंठाल नदी के दूर तक के जलक्षेत्र में जलकुंभी ने इस कदर जाल बिछाया है कि नदी का पानी दिखाई देना ही बंद हो गया है। जलकुंभी के कारण पानी में सूर्य का प्रकाश और आॅक्सीजन नहीं पहुंच पा रही है, जिससे पानी अब सड़ने लगा है। जलकुंभी एक आक्रामक खरपतवार है जो तेजी से पानी को सुखा देती है और जलीय जैव विविधता को नष्ट कर देती है।

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