उज्जैन। एलपीजी गैस की किल्लत के दौर में तकरीबन फ्री मिलने वाली खाद्य गैस को लेकर जिले में उपयोगकर्ता नहीं के बराबर हैं। यहां तक की जिले की बडी गौशालाओं के आसपास भी इस प्रकार के संयंत्र नहीं हैं। खास तो यह सामने आ रहा है कि पिछले 10 वर्षों में जिले में गौबर गैस के 700 संयंत्र लगाए गए और सबसिडी दी गई लेकिन रख रखाव एवं उपयोग नहीं होने से उसमें से 346 संयंत्र बंद हो गए। इसकी पुष्टि के लिए एमपी स्टेट एग्रो के क्षेत्रीय प्रबंध पवन परमार के मोबाईल पर संपर्क का प्रयास नोरिप्लाय के कारण सार्थक नहीं हो सका।
देसी को प्राथमिकता पर लेने वाली सरकार के लिए यह बेक फूट पर आने जैसा मामला है जहां भरपूर गोबर होता है उसके बावजूद उसके उपयोग से खाद्य गैस को लेकर उपयोगकर्ता ही खडे नहीं हो पा रहे हैं। जिले में भी इसकी स्थिति दयनीय ही सामने आ रही है। भरपूर गोबर मिलने वाले क्षेत्र में ही गोबर गैस को लेकर जागरूकता की स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं के बराबर ही सामने आ रही है।
दस सालों में 700 प्लांट आधे से अधिक बंद-
अधिकारिक स्तर पर सामने आ रही जानकारी के अनुसार जिले में वर्ष 2016 से 2026 तक 700 गोबर गैस प्लांट लगाए गए। इसमें 354 वर्तमान में संचालित हो रहे हैं। जिले के 350 से अधिक परिवार गोबर गैस का उपयोग कर तकरीबन फ्री में ही खाद्य गैस का उपयोग कर रहे हैं। 346 गैस संयंत्र रखरखाव के अभाव में बंद हो गए हैं।
आम के आम गुटली के दाम वाला काम-
अधिकृत सूत्रों के अनुसार गोबरप्लांट लगाने के बाद इस पर किसी भी प्रकार का संधारण खर्च नहीं आता है। इसमें प्रतिदिन पानी में गोबर मिलाकर प्लांट में डालना पड़ता है। अंदर गैस बनती है, जिससे घरों तक पाइप के माध्यम से खाद्य गैस जलती है। प्लांट की दूसरी और खाद निकल जाती है, जो खेतों के लिए उपयोगी होती है। यानी गोबर गैस प्लांट लगाने से उपयोगकर्ता को लाभ ही लाभ है।
संयंत्र लगाने पर सबसिडी-
गोबर गैस संयंत्र लगाने पर सरकार द्वारा अनुदान भी दिया जाता है। जिले के शंकरपुर, खजूरिया, घट्टिया, सेमलिया नसर, नलवा सहित कई गांव ऐसे हैं, जहां लोगों ने गोबर गैस का प्लांट स्थापित किया।
रोज गोबर डालने के झंझट ही परेशानी-
इधर अधिकृत सूत्रों का कहना है कि ज्यादातर संयंत्र रोज गोबर घोल बनाकर डालने के झंझट के चलते ही बंद हो जाते हैं। प्लांट से गैस प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन इसमें गोबर में पानी मिलाकर तरल रूप में डालना होता है। अतिरिक्त कोई नया कार्य इसके संचालन के लिए करने की जरूरत नहीं पड़ती है। उपयोगकर्ता धीरे-धीरे गोबर मिलाना बंद कर देते हैं, जिससे प्लांट भी बंद हो जाता है।
गोबर गैस संयंत्र यूं तो वर्षों उपयोगी होते हैं। मात्र रखरखाव के अभाव में ही ये बंद होते हैं। इसे बंद करने का कोई औचित्य नहीं है। यूं तो ये शत प्रतिशत लाभदायक ही है। स्थापना के बाद इस पर किसी प्रकार कोई खर्च नहीं करना पड़ता है।
घनमीटर के अनुसार लगता है गोवर-
राष्ट्रीय बायो एनर्जी कार्यक्रम के तहत नवीन एवं नक्करणीय ऊर्जा मंत्रालय भारत सरकार व एमपी स्टेट एग्रो इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट कारपोरेशन लि. द्वारा गोबर गैस प्लांट लगाया जाता है। इसमें सरकार द्वारा घन मीटर क्षमता के अनुसार अनुदान 1, 2, 4, 6 घनमीटर के अनुसार सामान्य वर्ग और अजा, अजजा वर्ग को अलग-अलग दिया जाता है। 1 घनमीटर में 25 किलो, 2 घ.मी. में 50 कि., 3 घ.मी. में 75 किलो, 4 घ.मी. में 100 कि. व 6 घ.मी. में 150 किलो गोबर की आवश्यकता होती है। इससे 3-4 से लेकर 15-20 लोगों तक के लिए भोजन तैयार हो जाता है। इसमें सामान्य को 9800 से लेकर 22750 रु. व अजा-अजजा को 17 हजार से 29हजार 250 रुपये तक अनुदान दिया जाता है।