उज्जैन
ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर से 8 मार्च को रंगपंचमी पर श्री महाकालेश्वर वीरभद्र चल समारोह निकलेगा। मालवा की लोक परंपरा में इसे गैर कहा जाता है। वस्तुत: यह शौर्य व पराक्रम का प्रतीक है। इसमें राजसी परंपरा के प्रतीक ध्वज निकाले जाते हैं। 2100 साल पहले सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को परास्त करने के बाद राज्योत्सव की परंपरा शुरू की थी। कालांतार में राजा महाराजाओं ने इस परंपरा का निर्वहन किया।
मराठाकाल में यह परंपरा और समृद्ध हुई, महाकाल, सिंहपुरी, कार्तिकचौक, भागसीपुरा आदि मोहल्लों की गैर उसी शौर्य और पराक्रम का प्रतीक है। इतिहासकार व पुराविद डॉ. रमण सोलंकी ने बताया लोक कथानक व किवदंतियों में मिले प्रमाण बताते हैं कि उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को परास्त करने के बाद पृथ्वी के अवतरण दिवस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर राज्योत्सव मनाने की परंपरा शुरू की। शंख, ढोल, नगाड़े की मंगल ध्वनि के साथ विजय ध्वजों का आरोहण किया।