मुख्य सडकों पर ही हाकर्स जोन के हालात बने हुए,सूचारू आवागमन कैसे हो फूटपाथ गायब, हाकर्स जोन बने ,कैसे हो यातायात व्यवस्थित -नगर निगम प्रशासन प्रमुख बाजारों में हाकर्स जोन बनाने को लेकर गंभीर नहीं

 

उज्जैन। शहर में यातायात की बदहाल स्थिति के कारण सूचारू आवागमन की समस्या बढती जा रही है। फूटपाथ गायब हो चुके हैं और हाकर्स जोन बने हुए हैं। ऐसी हालत में व्यवस्थित यातायात आखिर कैसे हो। नगर निगम प्रशासन प्रमुख बाजारों में हाकर्स जोन बनाने को लेकर गंभीर नहीं है। इसके चलते समस्या से जद्दोजहद के साथ ही वाहन चालक आवागमन कर रहे हैं।

यातायात की व्यवस्था पुलिस ही नहीं स्थानीय शासन की अहम जिम्मेदारी है। ऐसे में नगर निगम प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से मुंह बाए खडा है। शहर में पैदल चलने वालों के लिए फूटपाथ गायब है। हाकर्स जोन बने हुए हैं। सवाल यह है कि यातायात सुव्यवस्थित हो तो कैसे ?

शहर में यातायात की बदहाली अब ऐसी बीमारी के रूप में सामने आती जा रही है जो लाईलाज के स्तर पर जा पहुंची है। पुलिस जैसे ही एक्शन मोड पर आती है तो हस्तक्षेप शुरू हो जाता है। सडकों तक अतिक्रमण पसरा पडा रहता है। उसे हटाने की जिम्मेदारी नेतृत्वकर्ता निभाने की बजाय हितबद्ध पक्ष को अपनाए हुए हैं। पैदल आवागमन कर्ताओं के लिए सडकों से फूटपाथ पूरी तरह से गायब हो चुका है जिसे लेकर कोई भी पहल करने को तैयार नहीं है। सुव्यवस्थित यातायात के लिए पुलिस समय –समय पर अपनी चिंता को सडक पर उतर कर अंजाम देती है।

उपेक्षा के बीच अपेक्षा अधिक-

यातायात में नियमों को तोडने वाले वाहनों एवं चालकों पर पुलिस नजर रखती है। इसके लिए स्मार्ट सिटी के तहत सभी स्थानों पर कैमरा भी लगे हैं जिनके कैप्चर के आधार पर नियमों का उल्लंघन करने वालों को ई-चालान भेजे जाते हैं। मोटर व्हीकल एक्ट का पालन करवाना शहर के अंदर यातायात पुलिस एवं शहरी सीमा के बाहर परिवहन विभाग का काम है। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर बनाए गए नियमों के तहत वाहनों का व्यवस्थित पार्किंग एवं वाहनों के स्टैंड के संचालन नियम का पालन करवाना पुलिस के कार्यों में शामिल है। इससे भी अधिक पुलिस से कई ऐसे कार्यों की अपेक्षा यातायात में की जाती है जो उसके हैं ही नहीं। खास तो यह है कि उज्जैन जैसे धार्मिक शहर में आए दिन होने वाले आयोजनों के बाद भी यातायात पुलिस के पास एक तिहाई अमला ही है। उसमें से भी अमले का उपयोग व्यवस्था के लिए अन्यत्र भी किया जाता है। ऐसी ही अन्यानेक उपेक्षाओं के बीच यातायात में पूरी व्यवस्था की अपेक्षा पुलिस से अधिक से अधिक की बनी हुई है। हाल यह हैं कि पुलिस से ठेले एवं हाकर्स जोन की व्यवस्था की उम्मीद के साथ ही सडकों तक पसरा दुकानदारों का सामान हटवाने की अपेक्षा भी रखी जाती है। इस दौरान व्यवसायिक वाहन चालकों की उद्दंडता भी सामने आती है। उसमें यातायात पुलिस को कटघरे में लेकर उसकी उपेक्षा की जाती है।

10 फीसदी पुलिस का काम 90 फीसदी स्थानीय शासन का-

अपेक्षाओं के बीच उज्जैन की यातायात पुलिस के साथ उपेक्षा का खेल जारी है।  शहर की आंतरिक यातायात व्यवस्था में यातायात पुलिस का 10 फीसदी ही काम होता है। इसका दुसरा पक्ष यह है कि  90 फीसदी काम स्थानीय प्रशासन एवं शासन का है कि वह उस व्यवस्था को बना कर दे जिस पर यातायात पुलिस पालन करवा सके।

जिसकी जहां इच्छा वैसे व्यवसाय-

शहर की यातायात व्यवस्था के वर्तमान हाल यह हैं कि जिसकी जहां जिस हद तक व्यवसाय की इच्छा होती है वह अपने व्यवसाय को उस हद तक अंजाम दे रहा है। प्रमुख मार्गों पर दुकानदारों की दुकान से ज्यादा उनका अस्थाई अतिक्रमण सामने आ जाता है। ठेलों के लिए हाकर्स जोन की स्थिति अस्पष्ट है। फ्रीगंज के मुख्य मार्ग घंटा घर से शहीद पार्क तक के क्षेत्र में दोनों और ठेले वालों का अतिक्रमण हो जाता है। दुकानदारों की दुकानें बाहर सडक तक लग जाती है। पैदल चलने वालों को सडक के बीच तक चलकर आवागमन करना पडता है। यही हाल देवासगेट से महाकाल तक पूरे दो किलोमीटर मार्ग पर देखे जा सकते हैं।

ये भी व्यवस्थित नहीं-

शहर के बाजारों में पार्किंग की व्यवस्था कहीं भी व्यवस्थित नहीं देखी जाती है।हाल यह हैं कि पार्किंग व्यवस्थित न होने से यहां वहां चाहे जहां वाहन पार्क होते हैं पुलिस कार्रवाई करती है तो उस पर प्रश्न चिन्ह लगता है। शहरी लोक परिवहन के वाहनों के लिए स्टेंड का निर्माण नगर निगम के तहत आता है। यहां तक की स्टैंड पर खडे रहने वालों की संख्या निर्धारित की जाती है। निर्धारित संख्या से अधिक वाहनों के आने पर उनके चालान बनाने का काम यातायात पुलिस का होता है। हाल यह हैं कि यातायात व्यवस्था सूचारू होने के लिए नगर निगम की और से जो प्राथमि‍क आधारभूत कार्य होने चाहिए वो ही देखने को नहीं मिल रहे हैं।

 

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