ब्रह्मास्त्र नई दिल्ली
भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एमएम नरवणे एक बार फिर सुर्खियों में हैं और इस बार वजह उनकी कोई सैन्य रणनीति नहीं बल्कि उनकी नई किताब द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड अनअर्थिंग मिलिट्री मिथ्स एंड मिस्ट्रीज है। बुधवार को उनके प्रकाशक रूपा पब्लिकेशंस ने इस बहुप्रतीक्षित नॉन-फिक्शन किताब की घोषणा कर दी है जो भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना के उन अनछुए पहलुओं और लोककथाओं को उजागर करती है जो अब तक पर्दे के पीछे थे। यह किताब ऐसे समय में सामने आई है जब इसी साल की शुरूआत में उनकी पिछली संस्मरण पुस्तक फोर स्टार्स आॅफ डेस्टिनी को लेकर देश की संसद से लेकर मीडिया तक में जबरदस्त विवाद देखने को मिला था। वह किताब अब तक अप्रकाशित है लेकिन नई किताब के बाजार में आने की खबर ने रक्षा गलियारों और पाठकों के बीच एक नई उत्सुकता पैदा कर दी है।
गौरतलब है कि जनरल नरवणे का पिछला संस्मरण उस वक्त विवादों के घेरे में आ गया था जब लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक पत्रिका में छपे उसके कुछ अंशों का हवाला देते हुए साल 2020 में चीन के साथ हुए गतिरोध को लेकर केंद्र सरकार पर तीखे हमले किए थे। उस समय संसद में भारी हंगामा हुआ था और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा था कि किसी अप्रकाशित और अप्रमाणित किताब के अंशों को सदन के पटल पर उद्धृत नहीं किया जा सकता। यह विवाद इतना बढ़ गया था कि विपक्षी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव तक लाने की कोशिश की थी जिसे बाद में ध्वनि मत से खारिज कर दिया गया था। पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया ने भी तब स्पष्ट किया था कि उस संस्मरण के विशेष अधिकार उनके पास हैं और वह अभी प्रकाशित नहीं हुई है। खुद जनरल नरवणे ने भी सार्वजनिक रूप से कहा था कि उनकी उस किताब की कोई भी डिजिटल या प्रिंट कॉपी अभी उपलब्ध नहीं कराई गई है।
उसी विवादित पृष्ठभूमि के बाद आई यह नई किताब सैन्य इतिहास और परंपराओं के प्रति एक अलग दृष्टिकोण पेश करती है। प्रकाशक के अनुसार यह किताब वीरता, संस्कृति और वर्दी के प्रति जिज्ञासा का एक अनूठा दस्तावेज है। जनरल नरवणे ने इस किताब में उन कहानियों को पिरोया है जो अक्सर सैन्य मेस या चचार्ओं तक सीमित रह जाती हैं। उदाहरण के तौर पर किताब में यह दिलचस्प जानकारी दी गई है कि 17वीं और 18वीं शताब्दी की सिख सेना की जड़ों से ‘चक दे फट्टे’ जैसा लोकप्रिय नारा कैसे निकला। इसके अलावा इसमें कैप्टन बाबा हरभजन सिंह के बारे में भी विस्तार से लिखा गया है जिन्हें सैन्य लोककथाओं में एक अमर आत्मा के रूप में पूजा जाता है और माना जाता है कि वह आज भी सीमा पर अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं।
किताब की सामग्री केवल गौरवगाथाओं तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें ऐतिहासिक लड़ाइयों के मानवीय पहलुओं को भी छुआ गया है। नरवणे ने उस बदलूराम की कहानी को फिर से जीवंत किया है जिसके नाम पर प्रसिद्ध गीत ‘बदलूराम का बदन’ बना है। बदलूराम साल 1944 में कोहिमा की लड़ाई के दौरान शहीद हुए थे और उनकी दूरदर्शिता ने उनके साथियों को राशन की कमी से उबारा था। इसके साथ ही किताब यह भी बताती है कि कैसे बेंगलुरु शहर का नाम प्रथम विश्व युद्ध के दौरान एक ऐसे हथियार से जुड़ गया जिसने युद्ध की दिशा ही बदल दी थी। आईएनएस खुकरी की नियति, वायुसेना के पायलटों के खास कॉल साइन और ‘पेदोंगी’ नामक सैन्य खच्चर के अदम्य साहस जैसे कई हैरान करने वाले और कभी-कभी गुदगुदाने वाले किस्सों को इस नॉन-फिक्शन में जगह दी गई है।
द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड के ब्लर्ब में पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक का एक विशेष नोट भी शामिल है। प्रकाशकों ने इस किताब को एक ऐसी रचना बताया है जो केवल सतह की सच्चाई से संतुष्ट न होने वाले पाठकों के लिए किसी रोमांचक सफर से कम नहीं होगी। दिसंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक सेना प्रमुख रहे जनरल नरवणे का करियर चार दशकों से अधिक का रहा है जिसमें उन्होंने दुनिया की सबसे संवेदनशील सीमाओं पर कमान संभाली है। परम विशिष्ट सेवा पदक और अति विशिष्ट सेवा पदक जैसे सम्मानों से नवाजे गए नरवणे ने हाल ही में पुणे में एक कार्यक्रम के दौरान यह संकेत दिया था कि अब वह सैन्य रिपोर्टों के अलावा फिक्शन लेखन में भी हाथ आजमा रहे हैं। उनकी पिछली रहस्यमयी कहानी ‘द कैंटोनमेंट कॉन्स्पिरेसी’ को भी पाठकों ने काफी सराहा था। अब उनकी यह नई किताब सैन्य रहस्यों और मिथकों को जिस तरह से दुनिया के सामने ला रही है उससे उम्मीद जताई जा रही है कि यह रक्षा प्रेमियों के लिए एक अनिवार्य दस्तावेज साबित होगी। विवादों के साये से निकलकर जनरल नरवणे ने अपनी इस नई कलमकारी के जरिए भारतीय सशस्त्र बलों के उन गौरवशाली और विचित्र पहलुओं को संजोया है जो शायद ही कभी मुख्यधारा के इतिहास का हिस्सा बन पाते।