खुसूर-फुसूर समस्या निदान को लेकर हर्षित भूमिपूत्र…

खुसूर-फुसूर

समस्या निदान को लेकर हर्षित भूमिपूत्र…

दशकों की समस्या का निदान होता देख क्षेत्र का भूमिपूत्र हर्षित है। पास के जिले में इसका सफल प्रयोग हो चुका है। दक्षिण अफ्रीकी देश से आए विद्वतों की देखरेख में पास के जिले में जब समस्या से निजात दिलवाई गई और गिनती के ही उजाडू वन्यजीव बचे तो भूमिपुत्रों को यकीन हो गया कि अब मूल विभाग सही और तौर तरीके वाली योजना पर आया है। इसके बाद क्षेत्र में दुसरा प्रयोग धर्मनगरी के जिले में किया जा रहा है। अभी दावे तो बहुतेरे किए जा रहे हैं, उनकी सफलता पर संदेह भी नहीं है। धर्मनगरी के जिला मुख्यालय की तहसील से ही इसकी शुरूआत की जा रही है। वन्यजीवों को पकडने के लिए संबंधित प्रणाली के तहत एक पूरा बाडा भी बना दिया गया है। इस समस्या को लेकर पिछले 3 दशकों से भूमिपुत्र कई बार आंदोलन कर चुका है।धर्मनगरी के पश्चिमी छोर की तहसील में यह समस्या विकराल स्थिति में है। हर वर्ष मानसून एवं ठंड के मौसम में इन वन्यजीवों के कारण अनेक लोग हताहत होते हैं और कई तो काल कवलित हो चुके हैं। पूर्व में इन्हें पकडने के लिए तमाम प्रयास किए गए और उनका खर्च भी जमकर आया था। यही नहीं सफलता भी कोसों दूर नजर आई थी। इस बार सफलता नजदीक है और खर्च कम है। यहां तक की पास के जिले में तो और उडनखटोले का उपयोग हांका लगाने में किया गया था लेकिन धर्म नगरी के जिले की मुख्यालय तहसील में तो उसका उपयोग भी नहीं किया जा रहा है। पुरातन पद्धति का अनुशरण करते हुए ग्रामीणों को सीधा इससे जोडते हुए हांका लगवाया जाएगा और सीधे बाडे में इन्हें घेर दिया जाएगा। वहां से इन्हें ट्रकों में भरकर सीधे राष्ट्रीय उद्यान एवं अभ्यारण्यों में भेजा जाना है। क्षेत्र के किसानों ने भी योजना को जानकर पूरे सहयोग के लिए अपने आप को तैयार कर लिया है। अब इस पर अमल होने वाला है। बहुत जल्द हांका होगा और फसल उजाडू जीवों को बाडा में घेरकर उन्हें वहां से सीधे बाहर भेज दिया जाएगा। इससे भूमिपूत्रों की फसलों में होने वाले नुकसान को रोका जा सकेगा।खुसुर-फुसूर है कि जब पिछल वर्ष पास के जिले में यह पूरी योजना सफल हो चुकी थी तो फिर इसके अन्य जिलों में अमल को लेकर इतनी देरी क्यों की गई। इससे संबंधित विभाग के जिम्मेदारों ने तत्काल ही इस पर अन्य जिलों में अमल के लिए निर्णय क्यों नहीं लिए। एक बार फिर से फसल बोवनी होने वाली है और प्रदेश के पश्चिमी हिस्से के करीब 16 से अधिक जिलों में इस समस्या के निदान के लिए अभी शुरूआती दौर ही चलाया जा रहा है। एक साथ अगर इसे सभी जिलों में किया जाता तो कई सारे लाभ भी होते और गर्मी के मौसम में पानी के स्थानों के आसपास इसे किया जाता तो स्वत: ही जानवर वहां आकर उलझ जाता। देर आयद दुरूस्त आयद की स्थिति में इस बार की फसल भी अनेक जिलों में ये उजाडू जीव अपने काम से उजाड ही देंगे। वैसे इस बार की फसल बचाई जा सकती थी।

 

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