पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होने पर अगले 4-5 दिन में गिरेगा तापमान सक्रांति बाद कडक ठंड के आसार, मावठे इस बार रूठा हुआ -मावठा न गिरने से खेतों में नमी की स्थिति कमजोर,अधिकांश जगह सिंचाई की स्थिति

उज्जैन। इस बार ठंड के आसार अभी तक बहुत ज्यादा कडाके वाले नहीं रहे हैं,लेकिन अगले कुछ दिनों में पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने से इसमें जोरदार परिवर्तन के आसार है। कडाके की ठंड देखने को मिल सकती है। ठंडे दिनों का असर फरवरी आखिर तक जा सकता है। पिछले ढाई माह से मावठा नहीं गिरने से खेतों में रूखापन आने से अधिकांश जगह पर सिंचाई की स्थिति बन गई है।

मौसम विज्ञानी वीएस यादव का कहना है कि अभी मौसम शुष्क बना हुआ है, आगे भी बदलाव की ज्यादा संभावना नहीं है। कोई बड़ा सिस्टम नहीं है। इसलिए तापमान अभी इसी तरह बने रहेंगे। मामूली उतार चढ़ाव बना रहेगा। एक पश्चिमी विक्षोभ उत्तर पाकिस्तान और पंजाब की ओर चक्रवाती परिसंचरण के रूप में है। इसके दो तीन दिन बाद प्रभावी होने की संभावना है। इसके कारण अगर बर्फबारी होती है, तो चार पांच दिनों बाद फिर तापमान में गिरावट होने की संभावना है।

ये कारण है फरवरी तक ठंड के जाने का-

मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार प्रशांत महासागर में देरी से बनी कमजोर ला नीना के कारण इस बार सर्दी में ठंडे दिनों और कोल्ड वेव की संख्या सामान्य से अधिक हो सकती है। यानी ठंडे दिनों का असर फरवरी आखिर तक जा सकता है। मौसम का यह बदलाव वैश्विक तापमान वृद्धि के बावजूद जलवायु परिवर्तन के साथ क्षेत्रीय पैटर्न में उतार-चढ़ाव के व्यापक संकेत बता रहे है। उत्तर और मध्य भारत में कड़ाके की ठंड और घने कोहरे की स्थिति बनी हुई है। जबकि, पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में बर्फबारी की कमी दिख रही है।

मावठा नदारद,फसल को पानी की जरूरत-

ठंड का सीजन अपने अंतिम दौर में है। लेकिन, इस बार मौसम ने एक असामान्य स्थिति बनाई। बोवनी के बाद करीब ढाई महीने की ठंड का गुजर जाने के बावजूद प्रदेश में शीतकालीन बारिश यानी मावठे की एक भी बूंद नहीं गिरी। मौसम विशेषज्ञ इसे सूखी ठंड या ड्राई विंटर बता रहे हैं। इसका असर सिर्फ तापमान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हवा में नमी न होने से खेती पर संकट की स्थिति दिख रही है। मौसम चक्र पर भी खतरे के संकेत दिखाई देने लगे हैं। आमतौर पर 1 नवंबर 28 फरवरी के बीच दिसंबर-जनवरी में हल्का मावठा होता है। यही बारिश मिट्टी में नमी बनाए रखती है, जो फसलों को सजीवनी देती है और ठंड को संतुलित करती है। इस बार कड़ाके की ठंड के कई

रिकॉर्ड बने। लेकिन, हवा पूरी तरह शुष्क रही और आसमान ज्यादातर साफ रहा।कृषि जानकारों के अनुसार गेहूं, चना सरसों के लिए मावठा संजीवनी होता है। इस बार मावठा के नदारद होने से कृषकों को ज्यादा सिंचाई करनी पड़ रही है, जिससे लागत बढ़ी है। मिट्टी कीऊपरी परत सूखने और न्यूनतम तापमान गिरने से पाले का खतरा बढ़ गया है। आलू, टमाटर और मटर में कीट और वायरस का प्रकोप बढ़ने की आशंका है।

मौसम संतुलन चक्र बिगड रहा-

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि सर्दी में नमी की कमी का असर आगे भी दिख सकता है। मार्च में तेज गर्मी, प्री-मानसून में आंधी-तूफान और ओलावृष्टि की घटनाएं बढ़ सकती हैं। मानसून की शुरुआती चाल में भी बदलाव की आशंका है। सर्दियों में वायुमंडल को जरुरी नमी नहीं मिलती, तो मौसम का संतुलन चक्र बिगड़ जाता है। मौसम वैज्ञानिक एके शुक्ला के मुताबिक इस साल स्ट्रॉन्ग वेस्टर्न डिस्टर्वेस सक्रिय नहीं रहा। जो पश्चिमी विक्षोभ आए भी, वे कमजोर थे। इससे मध्य भारत तक नमी पहुंच ही नहीं पाई। न बादल बने और न बारिश की स्थिति बनी। नतीजा यह हुआ कि रात के तापमान में अचानक गिरावट आई और ठंड तीखी होती चली गई।

भूजल स्तर नीचे गिरा-

गेहुं एवं चने की फसल को मावठा की बारिश नहीं मिलने एवं खेतों में नमी को बनाए रखने के लिए इस बार कृषकों को अधिक मेहनत करना पड रही है। इसके चलते खेतों में खडी फसल को नमी के लिए सिंचाई करना कृषकों की मजबूरी हो गई है। थ्री फेस बिजली एवं पानी की उपलब्धता के आधार पर कृषक दिन एवं रात दोनों समय खेतों में पानी से सिंचाई कर रहे हैं। सिंचाई के लिए नलकूप ही मुख्य सहारा हैं। फसलों को बचाने के लिए भूजल का जमकर दोहन किया जा रहा है। इसके चलते सभी क्षेत्रों में भू-जल के स्तर में एक दम से गिरावट की स्थिति सामने आ रही है। इसके चलते कई नलकूप आकस्मिक तौर पर बंद हो रहे हैं। इस कारण से कई कृषकों को पानी की समस्या से भी दो चार होना पड रहा है।

 

 

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