उज्जैन। रतलाम जिले के सैलाना स्थित प्रसिद्ध खरमोर अभ्यारण में बीते 8 सालों से खरमोर पक्षी (Lesser Florican) प्रजनन के लिए नहीं आ रहे हैं। वन विभाग के तमाम प्रयासों के बाद भी इस वर्ष अभ्यारण्य के सैलाना और आंबा के कंपार्टमेंट खरमोर विहीन ही रहे हैं। केवल सैलाना ही नहीं बल्कि धार के सरदारपुर स्थित खरमोर अभ्यारण में भी इन पक्षियों ने आना बंद कर दिया है।वन विभाग के रेंजर राधेश्याम जोशी बताते हैं कि इस पक्षी को सबसे पहले पक्षी विशेषज्ञ असगरअली ने देखा था। उनके प्रयासों से सैलाना में खरमौर अभ्यारण्य की स्थापना हुई थी। यह पक्षी यहां प्रजनन के लिए बरसात के इन दिनों में आता था। आवाज निकालकर नर पक्षी मादा को लुभाने के लिए जंपिंग करता है। अभ्यारण्य का नोटिफिकेशन होने के बाद पिछले 3 वर्ष पूर्व शिकारवाडी का 250 हेक्टेयर को कम करके वन विभाग के कंपार्टमेंट में आंबा क्षेत्र के 2 कंपार्टमेंट को जोडा गया है। दुर्लभ किस्म के पक्षियों के लिए काम करने वाले एक एनजीओ और वन विभाग के सर्वे में खरमोर पक्षियों के रूठ जाने का मुख्य कारण बड़ी संख्या में इस क्षेत्र में लगे पवन चक्की प्रोजेक्ट, मानवीय दखल, नीलगाय और गिट्टी की खदानें हैं। जिसके कारण अब खरमोर पक्षी इन अभयारण्य में प्रजनन के लिए नहीं पहुंचते हैं। खासकर पवन चक्की प्रोजेक्ट इन पक्षियों के माइग्रेशन की राह में बाधा बन रहे हैं।
वन विभाग के एसडीओ एवं अभयारण्य अधीक्षक अधिकारी दिनेश कुमार जमरे ने बताया कि “खरमोर पक्षी हर वर्ष प्रजनन के लिए वर्षा काल में इन अभयारण्य में पहुंचते थे, लेकिन पिछले 8 सालों से एक भी पक्षी यहां नहीं पहुंचा है। प्रारंभिक निरीक्षक और जांच में यह सामने आया है कि इस क्षेत्र में पहाड़ियों पर लगे हुए पवन चक्की प्रोजेक्ट की वजह से इन पक्षियों का माइग्रेशन रूट डिस्टर्ब हुआ है। अभयारण्य के आसपास खेती और अन्य गतिविधियों की वजह से भी पक्षी नहीं आ रहे हैं। फेंसिंग नहीं होने की वजह से घास के मैदान में मवेशी और जंगली जानवर जैसे नीलगाय ऊंची घास को खा जाते हैं और नष्ट भी करते हैं जिसकी वजह से इस पक्षी के लिए अंडे देने और छुपने की जगह खत्म होती जा रही है। अभयारण्य के आसपास के क्षेत्र में होने वाली माइनिंग और सड़क निर्माण की वजह से भी इन पक्षियों के प्राकृतिक आवास पर असर पड़ा है।”