ब्रह्मास्त्र उज्जैन
सिंहस्थ कुंभ 2028 को लेकर तैयारियों का दौर तेज हो गया है और इसी के साथ साधु-संतों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की घोषणा की गई है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने सिंहस्थ से पहले नकली साधुओं पर शिकंजा कसने के लिए कालनेमी अभियान चलाने का फैसला किया है। इस अभियान के तहत भगवा वस्त्र पहनकर साधु बनने वाले बहुरूपियों की पहचान की जाएगी और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। परिषद का कहना है कि आने वाले सिंहस्थ में शामिल होने वाले साधु-संतों के लिए आधार कार्ड और संबंधित अखाड़े का पहचान पत्र रखना अनिवार्य किया जाएगा, ताकि असली और नकली साधुओं के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सके।
अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्र पुरी ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में देशभर में नकली साधुओं की संख्या तेजी से बढ़ी है, जिससे न केवल धार्मिक परंपराओं की गरिमा प्रभावित हो रही है बल्कि सुरक्षा संबंधी खतरे भी पैदा हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि कई लोग भगवा वस्त्र पहनकर साधु होने का दावा करते हैं, जबकि उनका किसी अखाड़े या धार्मिक परंपरा से कोई संबंध नहीं होता। ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें रोकने के लिए कालनेमी अभियान चलाया जाएगा। परिषद के अनुसार सिंहस्थ जैसे विशाल धार्मिक आयोजन में लाखों श्रद्धालु आते हैं और इस दौरान सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखना बेहद जरूरी होता है।
रविंद्र पुरी ने कहा कि उत्तराखंड में हाल ही में इसी तरह का अभियान चलाकर कई नकली साधुओं की पहचान की गई और उनके खिलाफ कार्रवाई की गई थी। उसी मॉडल को ध्यान में रखते हुए अब उज्जैन में भी इस अभियान को लागू करने की तैयारी की जा रही है। उनका कहना है कि जो लोग साधु-संतों की वेशभूषा में घूमते हैं लेकिन वास्तव में उनका जीवन संन्यास की परंपरा के अनुरूप नहीं है, उनके खिलाफ सख्ती बरती जाएगी।
उन्होंने यह भी कहा कि कुछ मामलों में ऐसे लोगों के उग्रवादी संगठनों से जुड़े होने की आशंका भी जताई जाती रही है, इसलिए पहचान की प्रक्रिया को मजबूत करना जरूरी है।
सिंहस्थ कुंभ को देश के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक माना जाता है और इसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और साधु-संत शामिल होते हैं। इस आयोजन में विभिन्न अखाड़ों के साधु-संत अपनी परंपराओं के अनुसार शाही स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। ऐसे में अखाड़ा परिषद का मानना है कि यदि साधुओं की पहचान सुनिश्चित नहीं की गई तो इससे आयोजन की पवित्रता और सुरक्षा दोनों प्रभावित हो सकती हैं। इसी कारण परिषद ने तय किया है कि सिंहस्थ में शामिल होने वाले हर साधु के पास आधार कार्ड और अखाड़े द्वारा जारी पहचान पत्र होना चाहिए।
अभियान के तहत साधुओं की पहचान के लिए अलग-अलग स्तर पर जांच की व्यवस्था की जाएगी। परिषद के प्रतिनिधि और संबंधित अखाड़ों के पदाधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि जो व्यक्ति साधु के रूप में सामने आ रहा है, वह वास्तव में किसी अखाड़े से जुड़ा हुआ है या नहीं। यदि किसी व्यक्ति के पास पहचान पत्र या प्रमाण नहीं मिलता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। परिषद का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य किसी को परेशान करना नहीं बल्कि धार्मिक परंपराओं की मयार्दा और सुरक्षा बनाए रखना है।
अखाड़ा परिषद ने इस दौरान गृहस्थ जीवन जी रहे साधुओं को भी चेतावनी दी है। परिषद के अध्यक्ष ने कहा कि संन्यास का अर्थ है सांसारिक जीवन और परिवार से दूरी बनाकर समाज और धर्म की सेवा करना। यदि कोई व्यक्ति साधु होने का दावा करता है लेकिन वह परिवार के साथ रह रहा है और सामान्य गृहस्थ जीवन जी रहा है, तो उसे भी जांच के दायरे में लाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि साधु-संतों का कार्य परमार्थ, यज्ञ-अनुष्ठान, धर्म प्रचार और समाज सेवा करना है, न कि परिवार का पालन-पोषण करना।
अखाड़ा परिषद ने यह भी स्पष्ट किया कि पिछले कुछ वर्षों में कुछ विवादित मामलों ने भी साधु-समाज की छवि को प्रभावित किया है। परिषद ने उदाहरण देते हुए बताया कि सिंहस्थ 2016 के दौरान मन्दाकिनी देवी को महामंडलेश्वर की उपाधि दी गई थी, लेकिन बाद में उन पर आपराधिक मामलों के आरोप सामने आने के बाद वर्ष 2024 में उन्हें पद से हटा दिया गया था। हाल ही में उन पर एक अन्य महामंडलेश्वर को झूठे रेप केस में फंसाने का मामला भी दर्ज हुआ है। हालांकि मन्दाकिनी देवी ने इन आरोपों को नकारते हुए परिषद अध्यक्ष पर ही उन्हें झूठा फंसाने का आरोप लगाया है।
इन घटनाओं के बाद अखाड़ा परिषद साधु-समाज की विश्वसनीयता और अनुशासन बनाए रखने के लिए और अधिक सतर्क हो गया है। परिषद का कहना है कि सिंहस्थ जैसे बड़े धार्मिक आयोजन में यदि नकली साधुओं की मौजूदगी होती है तो इससे श्रद्धालुओं की आस्था पर भी असर पड़ता है। इसलिए पहचान की प्रक्रिया को मजबूत करना जरूरी है। परिषद ने कहा कि आने वाले समय में साधुओं के पंजीकरण और पहचान से जुड़ी व्यवस्था को और व्यवस्थित किया जाएगा।
उज्जैन में सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के बीच कालनेमी अभियान की घोषणा को एक बड़ा कदम माना जा रहा है। धार्मिक संगठनों का मानना है कि इससे साधु-समाज की गरिमा और विश्वसनीयता को बनाए रखने में मदद मिलेगी। वहीं प्रशासनिक स्तर पर भी इस पहल को सुरक्षा और व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाले समय में इस अभियान की रूपरेखा और स्पष्ट की जाएगी और सिंहस्थ से पहले चरणबद्ध तरीके से इसे लागू करने की तैयारी की जा रही है।