स्मार्ट मीटरों की संख्या बढऩे के साथ ही उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ बढ़ेगा, जिससे बिजली की दरें बढ़ेंगी
उज्जैन। पूरे प्रदेश के साथ ही उज्जैन में भी भले ही स्मार्ट मीटर लगाने का कार्य जारी हो लेकिन इस मीटर को लगाने का खर्च अर्थात इस्टालेशन, मेंटेनेंस, ऑपरेशन आदि जैसे खर्च बिजली बिलों के माध्यम से उपभोक्ताओं से ही वसूला जाएगा।
जो जानकारी प्राप्त हुई है उसके अनुसार विद्युत विनियामक आयोग के हालिया टैरिफ के अनुसार, स्मार्ट मीटरों की संख्या बढऩे के साथ ही उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ बढ़ेगा, जिससे बिजली की दरें बढ़ेंगी। अब स्मार्ट मीटर का खर्च प्रति यूनिट खपत के आधार पर बिजली बिलों में शामिल कर वसूला जाएगा। इस बीच, सरकार स्मार्ट प्रीपेड मीटर इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं को 25 पैसे प्रति यूनिट की अतिरिक्त छूट और सोलर आवर (सुबह 9 से शाम 5 बजे) में 20 प्रतिशत की छूट दे रही है।
गौरतलब है कि मप्र विद्युत विनियामक आयोग के हालिया टैरिफ आदेश में खुलासा हुआ है कि बिजली वितरण कंपनियां वित्तीय वर्ष 2026-27 में उपभोक्ताओं से कुल 513.62 करोड़ का लीज चार्ज वसूलेंगी। यह राशि सीधे बिल में अलग से नहीं दिखाई देगी, बल्कि बिजली दरों (टैरिफ) में शामिल कर धीरे-धीरे वसूली जाएगी। गौरतलब है कि स्मार्ट मीटर परियोजना को केंद्र सरकार की आरडीएस योजना के तहत लागू किया जा रहा है। इसका उद्देश्य बिजली आपूर्ति को अधिक पारदर्शी विश्वसनीय और कुशल बनाना है। स्मार्ट मीटर से रियल-टाइम डेटा मिलने से बिलिंग में गड़बड़ी कम होगी, बिजली चोरी पर अंकुश लगेगा और लाइन लॉस घटाने में मदद मिलेगी। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी सुधार के साथ-साथ इसका आर्थिक असर भी उपभोक्ताओं को झेलना पड़ेगा।
चूंकि यह खर्च टैरिफ में जोड़ा जाएगा, इसलिए आने वाले समय में बिजली बिलों में बढ़ोतरी का असर साफ दिखाई दे सकता है। उल्लेखनीय है कि उज्जैन सहित प्रदेश में कुल 1,41,44,119 स्मार्ट मीटर लगाए जाने हैं। पहले चरण में 58,65,372 और दूसरे चरण 82,78,747 स्मार्ट मीटर लगाए जाएंगे। स्मार्ट मीटर लगाए जाने के लिए आयोग ने बिजली कंपनियों को 31 मार्च 2028 तक का समय दिया है। स्मार्ट मीटर टोटेक्स मॉडल पर लगाए जा रहे हैं। इस मॉडल में मीटर लगाने, संचालन और रखरखाव का पूरा खर्च एक निजी एजेंसी उठाती है और बिजली कंपनियां उसे किस्तों के रूप में भुगतान करती हैं। यह लागत अंतत: उपभोक्ताओं से वसूली जाती है। आयोग ने इस मंजूरी को पूरी तरह अंतिम नहीं माना है, बल्कि इसे अस्थायी रूप से स्वीकृत किया है। भविष्य में टू-अप प्रक्रिया के दौरान कंपनियों के वास्तविक खर्च और प्रदर्शन की समीक्षा की जाएगी। यदि कंपनियां तय लक्ष्यों-जैसे समय पर स्मार्ट मीटर लगाना, सही बिलिंग और सेवाएं देना-पूरा नहीं कर पाती हैं, तो इस राशि में कटौती भी की जा सकती है।