टेसू के फूलों के गुलाल से बनेगा तिरंगा, कभी बैलगाड़ी पर रखे कड़ाव में लोगों को भिगोते थे
ब्रह्मास्त्र इंदौर
इंदौर में रंगपंचमी की पारंपरिक गेर रविवार को निकलेगी। राजवाड़ा पर 7 दशक पहले कड़ाव में लोगों को भिगोने से शुरू हुआ सिलसिला बैलगाड़ी, ट्रैक्टर और डीजे से होता हुआ अब मिसाइलों से रंग बरसाने तक जा पहुंचा है।
पिछले 3 सालों से यहां पहुंचने वाले लोगों की संख्या 5 लाख से अधिक रही है। जिससे यह यह आयोजन देश के सबसे बड़े रंगोत्सवों में शामिल हो चुका है।
हर साल की तरह इस बार भी लाखों लीटर पानी और हजारों किलो गुलाल उड़ाने की तैयारी है। राजवाड़ा और उससे जुड़े मार्गों पर करीब 5-6 किलोमीटर के दायरे में गुलाल, रंग और पानी की बौछारें होंगी। 8 हजार किलो टेसू के फूलों से बने गुलाल से राजवाड़ा पर तिरंगा बनाया जाएगा।
गेर और फागयात्रा अपने-अपने तय स्थानों से निकलकर शहर की जनता को रंगों से सराबोर करेंगी। मिसाइलों से 200 फीट ऊपर तक रंग और पानी उड़ाया जाएगा। गेर में डीजे, ढोल-ताशे, झांकियां और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी शामिल रहेंगी।
अलग-अलग क्षेत्रों से निकलने वाली गेर में कई खास आकर्षण देखने को मिलेंगे। संगम कॉर्नर की 76वीं सामाजिक समरसता गेर में बरसाना की लट्ठमार होली और राधा-कृष्ण की रासलीला प्रस्तुत की जाएगी, जबकि रसिया कॉर्नर की 53वीं गेर में दर्जनों वाहन, पानी के टैंकर और विशेष झांकियां शामिल होंगी। मॉरल क्लब समिति और टोरी कॉर्नर की गेर में भी बड़ी संख्या में युवा डीजे, ढोल और रंग-गुलाल के साथ शामिल होकर उत्सव का माहौल बनाएंगे।
वहीं नृसिंह बाजार स्थित बद्रीनारायण मंदिर से निकलने वाली प्रदेश की सबसे बड़ी धार्मिक-सांस्कृतिक फागयात्रा का यह 28वां वर्ष है। यात्रा में विशाल नंदी पर सवार महादेव की अद्भुत झांकी, महाकाल मंदिर की प्रतिकृति, भजन मंडलियां और हजारों मातृशक्तियों की भागीदारी प्रमुख आकर्षण रहेगी। इस तरह आस्था, परंपरा और उत्साह से भरा यह आयोजन एक बार फिर पूरे इंदौर को रंगों में सराबोर कर देगा।
1990 के दशक से गेरों की संख्या बढ़ने लगी और टैंकर तथा म्यूजिक का चलन शुरू हुआ। 2000 के दशक में रंग उड़ाने वाली मिसाइलों का उपयोग शुरू हो गया। गेर आयोजक शेखर गिरी के अनुसार, कड़ाव से पानी फेंकने की परंपरा 1948-1950 के आसपास शुरू हुई थी और हर दशक के साथ इसका स्वरूप बदलता गया।