कानड़। शीतला सप्तमी पर सुबह 5 बजे से ही शीतला माता की पूजा करने के लिए मंदिरों में महिलाओ की भीड़ लगी रही। बारी बारी से महिलाओं ने
धन-धान्य से भंडार भरने वाली और प्राकृतिक विपदाओं से दूर रखने वाली शीतला माता की पूजा कर उन्हे स्वादिष्ट भोजन का भोग लगाया।नगर के मध्य मां बिजासन माता के मंदिर में सुबह सेही आलम यह थे कि अपनी बारी का इंतजार करते हुए महिलाओं को पूजा के लिए इंतजार करना पड़ा।
शीतला सप्तमी होली के सातवें दिन चैत्र माह के कृष्णपक्ष की सप्तमी तिथि पर मनाया जाता है। इस दिन शीतला माता का पूजन बासी और ठन्डे व्यंजनों का भोग लगाया है। जिसके के बाद घर के सभी सदस्य सिर्फ ठन्डे व्यंजन ही खाते हैं। शीतला माता का मंदिर वटवृक्ष के समीप ही होता है। इसलिए शीतला माता के पूजन के बाद वट की पूजा भी की जाती है।ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से शीतला देवी धन-धान्य से पूर्ण कर प्राकृतिक विपदाओं से दूर रखती हैं। इसके साथ ही पूजा करने एवं नियम और संयम से व्रत रखने पर चेचक, खसरा आदिरोगों का प्रकोप नहीं फैलता है।सुबह स्नान करके शीतला मां की पूजा की जाती है।इस दिन घर में ताजा भोजन नहीं बनाया जाता ।शीतला सप्तमी के एक दिन पहले मीठा भात, पुए, पकौड़े, रबड़ी, रोटी और पूड़ी सब्जी आदि बनाए जाते हैं।रात को सारा भोजन बनाने के बाद रसोईघर की सफाई करके पूजा की जाती है। पूजा में रोली, मौली, पुष्प, वस्त्र आदि अर्पित किया जाता है। इस पूजा के बाद चूल्हा नहीं जलाया जाता। इसी मान्यता और आस्था के साथ नगर की महिलाओं ने शीतला माता की पूजा की।
सारंगपुर।
सारंगपुर में मंगलवार सुबह शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में शीतला सप्तमी पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया। इस अवसर पर महिलाओं ने घरों और मंदिरों में माता शीतला की पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना की। शहर के शीतला माता मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड उमडी। शीतला माता मंदिरों में सुबह से ही पूजा-अर्चना शुरू हो गई थी।
महिलाओं ने मंदिरों में पहुंचकर माता शीतला को हल्दी, रोली, फूल और ठंडा जल अर्पित किया। परंपरा के अनुसार, शीतला अष्टमी के दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता है। इसके चलते महिलाओं ने एक दिन पहले ही पूडी, पुआ, मीठे चावल, दही और अन्य पकवान तैयार कर लिए थे। मंगलवार सुबह पूजा के बाद माता को इन्हीं ठंडे और बासी व्यंजनों का भोग लगाया गया। बाद में इसी प्रसाद को परिवार के सदस्यों ने ग्रहण किया। पंडित पवन पारीक ने बताया कि धार्मिक मान्यता है कि माता शीतला की पूजा करने से चेचक, बुखार और अन्य मौसमी बीमारियों से रक्षा होती है, साथ ही घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। महिलाओं ने बताया कि यह पूजा घर-परिवार की खुशहाली, शांति और समृद्धि के लिए की जाती है। मंदिरों में दिनभर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। पुराणों के अनुसार, शीतला माता गधे पर विराजमान हैं और उनके हाथों में झाडू, नीम के पत्ते तथा कलश होता है। उनका मस्तक सूप से सजा है। होलिका दहन के बाद श्रद्धालु मन्नातें लेते हैं और सप्तमी पर शीतला माता का पूजन कर ठंडा भोजन करते हैं। इस परंपरा का एक संदेश यह भी है कि आने वाली गर्मी के मौसम में इस दिन के बाद बासी भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।
जगोटी
जगोटी में महिलाओं ने आधा दर्जन स्थानों पर माता शीतला की परंपरानुसार पूजा अर्चना कर परिवार के सौभाग्य व आरोग्य की कामना करते हुए एक दिन पहले बनाए भोजन अर्पित किया । अल सुबह से मध्यान्ह तक बड़ी संख्या में महिलाओं में शीतला माता की पूजा की। पूजा के पश्चात् महिलाओं ने अपने घरों पर हल्दी के सौभाग्य सूचक छापे मुख्य द्वार पर लगाए व पर्व की कथा का श्रवण किया। चारभुजा मंदिर के पुजारी पंडित बनवारी लाल शर्मा ने बताया कि शीतला सप्तमी का पौराणिक व वैज्ञानिक महत्व है यह पर्व ऋतु परिवर्तन के साथ हमें ठंडे व बासी भोजन से परहेज करना चाहिए व शीतल जल से स्नान करना चाहिए, यह पर्व हमें निरोग रहने के प्रति प्रेरित करता है ।
शीतला सप्तमी पर ठन्डे पानी से नहा कर शीतला माता को लगाया बासी खाने का भोग