ब्रह्मास्त्र इंदौर
मप्र सरकार का दावा है कि उसका फोकस प्रदेश के हर वर्ग के संरक्षण और कल्याण पर है। लेकिन हकीकत यह है कि मप्र में सामानय वर्ग के साथ लगातार अनदेखी हो रही है।
इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सामान्य वर्ग के लिए गठित सामान्य निर्धन वर्ग कल्याण आयोग का कही नाम-पता नहीं रख गया है। आयोग कागजों में सिमट कर रह गया है।
आयोग में पदाधिकारी न होने से सवणों की आवाज उठाने वाला कोई नहीं है। यही नहीं मुख्यमंत्री मेधावी योजना पर भी बजट का संकट है।
जबकि एससी-एसटी, ओबीसी व अल्पसंख्यकों के लिए जहां अलग विभाग है, वहीं योजनाओं और बजट की भरमार है। एससी-एसटी, ओबीसी व अल्पसंख्यकों की समस्याओं को लेकर सरकार हमेशा सजग रहती है। वहीं सामान्य वर्ग को लेकर कभी भी संवेदनशीलता नजर नहीं आती है। सरकार ने सामान्य वर्ग के हितों के संरक्षण के लिए मध्य प्रदेश राज्य सामान्य निर्धन वर्ग कल्याण आयोग का गठन तो किया, लेकिन यह केवल कागजों तक सीमित रह गया है। स्थिति यह है कि आयोग में लंबे समय से अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या किसी भी पदाधिकारी की नियुक्ति नहीं हुई है। नेतृत्व के अभाव में सामान्य वर्ग के निर्धन लोगों की सुनवाई पूरी तरह ठप पड़ी है, जिससे इस वर्ग अल्पसंख्यकों के लिए तो समर्पित विभाग और वित्त निगम सक्रिय हैं, लेकिन सामान्य वर्ग के कल्याण के लिए कोई प्रभावी तंत्र नजर नहीं आ रहा है। इसे लेकर अब समाज के विभिन्न हलकों में वर्ग भेद और में विभाजन की लकीरें गहरी होने की चिंता जताई जा रही है। मध्य प्रदेश में संवैधानिक समानता के दावों के बीच प्रशासनिक ढांचा वर्गों में बंटा नजर आता है।
सामान्य वर्ग के लिए कोई प्रभावी तंत्र नहीं
ल्ल यूजीसी के नए नियमों को लेकर उपजा विवाद भले ही सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद कानूनी रूप से थमता दिख रहा हो, लेकिन इसने मध्य प्रदेश में सामान्य वर्ग की उपेक्षा के पुराने जख्मों को फिर से हरा कर दिया है।
ल्ल प्रदेश में एससी-एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों के नि सर्वांगीण विकास के लिए वर्ष 1991 से ही अलग विभाग काम कर रहा है।
ल्ल इसी तरह ल एससी-एसटी और ओबीसी वगों की समस्याओं और उनके आर्थिक सशक्तिकरण के लिए पृथक विभाग व वित्त विकास निगम गठित हैं। इन वर्गों की शिकायतों की सुनवाई के लिए राज्य और केंद्र स्तर पर शक्तिशाली आयोग भी मौजूद हैं।
ल्ल इसके उलट, सामान्य वर्ग के लिए न तो है कोई अलग विभाग है और न ही शिकायतों की है सुनवाई के लिए कोई प्रभावी आयोग।