खुसूर-फुसूर
टंकी है तो मिल क्यों नहीं रही…
शहर में खाद्य गैस के लिए जिधर देखो उधर लाईनें लग रही है। एजेंसी के बाहर से लेकर गोदाम तक और वहां से लेकर डिस्ट्रीब्यूशन पाइंट तक यही हाल कायम हो रहे हैं। नियमों के तहत उपभोक्ता से बात की जा रही है। बराबर उसके दिन गिने जा रहे हैं और उसके बाद भी सप्लाय में अधिक दिन लगाकर टंकी दी जा रही है। उपभोक्ता के घर तक टंकी नहीं पहुंचाई जा रही है उससे बराबर इसका चार्ज लिया जा रहा है। उपभोक्ता को टंकी लाने ले जाने के लिए आटो टैक्सी का सहारा लेना पड रहा है जिससे उसे अतिरिक्त व्यय करना पड रहा है। उपभोक्ता बराबर सवाल उठा रहे हैं कि उपलब्धता को लेकर जिला स्तर से कहा जाता है कि पर्याप्त सप्लाय मिल रहा है तो फिर वो कहां जा रहा है । लाईनें लगाने की नौबत क्यों बराबर बनी हुई है। दबी जुबान में एजेंसी वालों का भी कहना है कि इससे उपभोक्ता हम पर शक कर रहे हैं। रोज उपभोक्ताओं से चिक-चिक की स्थिति बन रही है। प्रतिदिन विवाद के हाल होना आम हो गया है।खास तो यह है किे इस पूरे मामले पर उपभोक्ता बराबर परेशान हो रहा है और जैसे –तैसे अपनी व्यवस्था को अंजाम दे रहा है। इसके लिए वह जुगाड भी लगा रहा है। जुगाड पूरे ढाई की पड रही है। जो कि घरेलू उपभोक्ता के लिए करीब ढाई गूना ही है। इस पर भी कुछ उपभोक्ता ढाई की जुगाड जमा रहे हैं और बराबर उनका काम हो रहा है। खुसूर –फुसूर है कि उपलब्धता को लेकर आम उपभोक्ता भी भ्रमित है। नियमों के दायरे में उपलब्धता का पेंच है। जैसे 25 दिन बाद ही नंबर लगना। ये सब हाईटेक है। इसमें एजेंसियों का काम मात्र नंबर लगाना और सप्लाय करना है। ये बात अलग है कि उपभोक्ता नियमों के पेंच की नासमझी में सवाल खडे कर रहा है।