“कांटों की छांव” में “आस्था का आनंद”

-पंचक्रोशी यात्रा पर आने वाले आस्था और विश्वास पर निकल पडते हैं धूप में भी

 

-तीन दशक से यात्रा मार्ग पर हो रहा पौध रोपण सार्थकता पर लगा रहा प्रश्नचिन्ह

उज्जैन। पंचक्रोशी यात्रा में आने वाले श्रद्धालू किसी सुविधा के मोहताज नहीं होते हैं वे एक पोटली में पुरी गृहस्थी समेट कर चलते हैं और उसे भी सिर पर इतने संतुलन से ढोते हैं कि पोटली को पकडना नहीं पडता है। यात्री बबूल की छाया में भी आस्था का आनंद समेट लेते हैं। इस यात्रा मार्ग के 118 किलोमीटर पर पिछले तीन दशकों में पौधारोपण किया गया है लेकिन उसकी छांव की दरकार आज भी है।

हाल लकडिया चंदन की जै बोलो यशोदा नंदन की… पंचक्रोशी दूर है बाबा से मिलना जरूर है… जैसे आस्था के गान करते हुए महिलाओं के जत्थे आगे बढते हैं तो उन्हें देखकर यही लगता है कि इनसे ही धर्म और आस्था जीवित है। अगाथ आस्था और श्रद्धा के साथ पैदल यात्रा करने वालों में 7 साल का जीवन है तो 79 वर्ष के वृद्ध भी शामिल हैं। उन्हें मार्ग पर धूप में चलते देख कर सवाल उठता है कि पिछले 3 दशक से भी अधिक समय से पंचक्रोशी मार्ग पर पौधरोपण किया जा रहा है लेकिन यह सार्थकता नहीं ले पा रहा है।

4 किलोमीटर की पूरी छाव,शेष धूप छाव-

यात्रा मार्ग में उज्जैन से पिंगलेश्वर मार्ग पर पूरी तरह से छायादार वृक्षों का अभाव है। शहरी क्षेत्र एवं ग्रामीण क्षेत्र दोनों में ही मार्ग के दोनों और बचे हैं तो अधिकांश बबूल के वृक्ष ही शेष हैं। पिंगलेश्वर से त्रिवेणी और करोहन के मार्ग में भी यही हाल हैं। मार्ग के दोनों और छायादार वृक्षों का अभाव है। करोहन से नलवा के लिए मार्ग में शुरूआत में करीब 4 किलोमीटर मार्ग वृक्षों से ऐसा आच्छादित है जैसे भगवान ने ही यात्रियों के लिए यह छाव की हो। इसके बाद पूरे मार्ग पर कहीं भी मार्ग के दोनों और पूरी छाव की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

तीन दशक 12 करोड से ज्यादा खर्च-

पिछले तीन दशक में उज्जैन वन विभाग ने पंचक्रोशी मार्ग को हरा भरा करने के लिए 12 करोड से अधिक का बजट खर्च किया है। इसमें हर साल इस मार्ग के एक टूकडे का चयन कर उस पर पौधारोपण करवाया गया और तार फेंसिंग सहित पौधों का पानी पिलाने का खर्च भी किया गया है। धरातल पर उन स्थानों पर देखें तो जहां हजारों वृक्ष लगाए गए थे वहां दहाई की संख्या में भी पेड नजर नहीं आ रहे हैं।

नौलखी बिड क्षेत्र में ही अभाव-

पिंगलेश्वर से करोहन मार्ग में वन विभाग की नौलखी बिड पडती है। इस क्षेत्र में कई बार पौधरोपण किया गया है लेकिन यहां भी यात्रियों को मार्ग के दोनों और छाव मिल जाए ये संभव हालात नहीं है। वृक्षारोपण की बजाय इस क्षेत्र में वन विभाग ने मनोरंजन के लिए पार्क को विकसित कर दिया है। इसके आगे भी पूरे मार्ग पर आस्था में डूबकी लगाने वाले श्रद्धालुओं को छाव तक नसीब नहीं हो रही है।

ग्रामीणों के खेतों में डेरा-

ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों में लगे ग्रामीणों के वृक्षों के नीचे सैंकडों श्रद्धालू छाव में पनाह लेते हैं। खेत के बीच में लगा वृक्ष अब भी साबूत खडा है। कई वृक्ष तो ऐसे हैं जो पंचक्रोशी यात्रियों के पडाव की पहचान बने हुए हैं। पंचक्रोशी यात्री कानवन से आए धर्मेन्द्र माली जी बताते हैं वे 13 वीं बार यात्रा कर रहे हैं। हर बार परिवार की महिलाओं के साथ यात्रा पर आते हैं। नए युवाओं ,बच्चों को भी लाते हैं। उज्जैन रामघाट से नागचंद्रेश्वर और पिंगलेश्वर सहित सभी पांच पडाव और उप पडाव पर  उनका स्थल तय है। बडे और घने वृक्ष के नीचे ही वे पडाव डालते हैं। परिवार के लोग अगर पीछे छूट जाते हैं तो उन्हें तलाश करने में कोई कठिनाई नहीं होती है। श्री माली कहते हैं कि यात्रा मार्ग के दोनों और विशेष प्रयास कर छायादार पौधरोपण किया जाना चाहिए जिससे यात्री छायादार मार्ग पर यात्रा का आनंद ले सकें।