प्लेन या ट्रेन में मांसाहार पर लगे प्रतिबंध, सिर्फ शाकाहारी भोजन ही किया जाए सर्व

 

कवि सौरभ जैन सुमन ने पीएम मोदी से की मांग, प्लेन या ट्रेन में कोई नॉनवेज खा रहा हो, और उसकी गंध चारों तरफ फैलती है, तो खड़ी होती है कई मुसीबत

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उज्जैन। हम शाकाहारी लोग जब प्लेन या ट्रेन में यात्रा करते हैं और हमारी बराबर वाली सीट पर कोई तामसिक भोजन कर रहा होता है, जिसमें लाशों के अंग होते हैं, जिसमें पशु अवशेष होते हैं , तब बहुत विषम परिस्थिति हमारे लिए उत्पन्न हो जाती है। तब उस समय न तो भोजन किया जा सकता है और न ही बैठा जा सकता है। मैं प्रधानमंत्री से आग्रह करूंगा कि प्लेन या ट्रेन की यात्रा में जो हम लोगों को भोजन दिया जाता है , कम से कम पूर्णतः सात्विक हो, शाकाहारी हो, जिसे खाते वक्त किसी को भी दिक्कत न हो। मुझे अपनी पंक्तियां याद आती हैं कि
“अंग लाश के खा जाएं, क्या फिर भी वह इंसान है। पेट तुम्हारा मुर्दाघर है या फिर कब्रिस्तान है।।”

अजीब होता है जब बराबर वाली सीट पर कोई नॉनवेज खा रहा हो

यह बड़ा अजीब होता है जब हमारे बराबर वाली सीट पर बैठा व्यक्ति पशु अवशेष की आंख नोच रहा होता है या उसकी हड्डियां अलग कर रहा होता है। ट्रेन में जब हम यात्रा कर रहे होते हैं तो मेरे साथ ऐसा अक्सर कई बार हुआ। जब मैं शुद्ध शाकाहारी भोजन कर रहा होता हूं और मेरी बराबर वाली सीट पर बैठा व्यक्ति नॉनवेज खा रहा होता है। थोड़ा सा गेप होता है, दोनों सीटों के बीच में। क्या यह किसी शाकाहारी व्यक्ति के लिए कि वह अपने बराबर वाली सीट पर बैठे व्यक्ति के साथ भोजन कर सके, संभव है। उस चेंबर में जो दुर्गंध आती है, हम शाकाहारी लोगों के लिए वहां की व्यवस्था बहुत खराब हो जाती है। मैं प्रधानमंत्री से निवेदन करूंगा कि कम से कम यात्राओं में जो भोजन दिया जाता है, जो हमें खाने को दिया जाता है वह पूर्णतः शाकाहारी हो। जिसे खाने में किसी को भी दिक्कत न हो। यह भी एक महत्वपूर्ण विषय है, क्योंकि तमाम शाकाहारी लोगों की ओर से मैं कवि सौरभ जैन “सुमन” यह निवेदन प्रधानमंत्री को पहुंचा रहा हूं। हमारे देश को एक ऐसे गौरवमयी प्रधानमंत्री मिले हैं जो सभी वर्गों का सम्मान करते हैं। जिनकी धर्म में आस्था भी है, तो आपसे कहना हमारा अधिकार भी बनता है और आपसे आशा भी है कि हमारे इस निवेदन पर आप पूरी तरह से संज्ञान लेंगे।
एक बार हम यदि पीड़ा अनुभव कर सकें, उन पशुओं की जिन्हें काटा जाता है ,उन्हें मारा जाता है, केवल भोजन के लिए। तब वो पंक्तियां मुझे याद आती हैं कि-
“आंखें कितना रोती हैं, जब उंगली अपनी जलती है। सोचो उस तड़पन की हद, जब जिस्म पर आरी चलती है।।
बेवसता तुम पशु की देखो कि बचने के आसार नहीं। जीते जी तन काटा जाए उसकी पीड़ा का पार नहीं।।
खाने से पहले बिरियानी, चीख जो उसकी सुन लेते। करुणावश होकर तुम भी गिरी गिरनार को चुन लेते।।

60% लोग नहीं करते मांसाहारी भोजन

चाहे ट्रेन हो या प्लेन हो यदि आप शाकाहारी भोजन देते हैं और अगर थोड़ी सी दूरी तय करने के लिए वह शाकाहारी भोजन कर भी लेते हैं, तो उसमें कहीं कोई परेशानी नहीं है, जो शाकाहारी न खाता हो। कम से कम 60 प्रतिशत ऐसे लोग हैं जो मांसाहारी भोजन नहीं करते। जो भोजन लाशों के टुकड़ों से बना हो, जो पशुओं के अंगों को काटकर बना हो, ऐसा भोजन सर्व न किया जाए। चाहे वह शाकाहारी हो या मांसाहारी हो। एक दूसरे की भावना का सम्मान करना चाहिए। यह बात हमारे प्रधानमंत्री को पूरे देश को कहना चाहिए।