खुसूर-फुसूर
बराबर मिलते रहे भविष्य से …
हर बार शैक्षणिक सत्र की शुरूआत में एक परंपरा का निर्वहन हमारी आदत बन चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में हमारे सरकारी शैक्षणिक स्थलों में काफी अच्छा सुधार आया है लेकिन अब भी उसे उस स्तर का नहीं कहा जा सकता है जो कि निजी स्कूलों का है। वह जब तक नहीं हो सकता है जब तक की मानसिक एवं आत्मिक रूप से उस जिम्मेदारी का स्वीकार नहीं कर लिया जाता है। तीन दिवसीय आयोजन में तमाम अफसर एवं जनप्रतिनिधियों ने एक दिन के लिए भविष्य के साथ भेंट कर ली । बच्चों से बातें हुई और खूद भी अपनी बातें कहीं और सूनी। यह प्रक्रिया मासिक की जाना चाहिए। स्कूलों में सुझाव एवं शिकायत की गोपनीय बाक्स लगाए जाना चाहिए जिसमें की बच्चे अपनी बात लिखकर डाल सकें। इस बाक्स को खोलने की स्थिति भी अत्यंत गोपनीय और जिला अधिकारी के समक्ष ही होना चाहिए। इसके साथ ही पढाई के स्तर को भी उंचा उठाने के लिए नए नए तरीकों पर काम किया जाना आवश्यक है। समाज में विद्या के व्यवसाय में निरंतर वृद्धि को देखते हुए गरीब एवं अमीर छात्रों में खाई बढने की स्थिति में मात्र कुछ स्कूलों को स्मार्ट बनाने और कुछ कक्षों को स्मार्ट बनाने की बजाय सभी स्कूलों को स्मार्ट बनाना अब बहुत ही आवश्यक हो गया है। इसके लिए भविष्य से भेंट करने वालों को अपने बच्चों को भी इन स्कूलों का रूख करवाना पडेगा,जिससे वे सीधे तौर पर इनसे जुडे रहें। ये सही है कि भविष्य से भेंट करने पहुंचे अधिकांश लोग इन्हीं शासकीय स्कूलों में सुविधा अभाव में ही पढे और आज वर्तमान की स्थिति तक पहुंचे हैं। खुसूर-फुसूर है कि विद्या दान अब एक प्रबंधकीय रूप में आ चुका है। अत्याधुनिक तरीके इसमें इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ऐसे में शासकीय स्कूलों में जिस तेजी के साथ व्यवस्था और शैक्षणिक स्तर में बदलाव आना चाहिए वह समय से कुछ पीछे है। धीरे-धीरे इसमें सुधार की स्थिति बराबर आगे बढ रही है। भविष्य से भेंट को भी रोचक बनाया जाना चाहिए ।