April 24, 2024

राष्ट्रपति के आदेश पर खुलेगी कश्मीर की असली फाइल, पंडितों के गुनहगारों को मिल सकेगी सजा..?

700 हिंदुओं की हत्या में 215 केस की फाइल दोबारा नहीं खुली..सिर्फ 31 आरोपियों पर केस दर्ज….बाकी सब अज्ञात … चार्ज शीट दाखिल हुई सिर्फ 24 केस में…1990 में 109 हिंदुओं की हत्या

कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर बनी फिल्म द कश्मीर फाइल्स के रिलीज होने के 32 साल बाद कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अन्याय की फाइल खोलने की मांग की जा रही है। कश्मीर फाइल्स फिल्म में जो सच दिखाया है, उसके बाद क्या अब कश्मीर में पंडितों के साथ हुए नरसंहार की फाइल खुलेगी? कश्मीरी पंडितों के पलायन को लेकर जांच के लिए राष्ट्रपति से अपील की गई है। राष्ट्रपति से जांच की अपील में कहा गया है कि पहले सही जांच न होने से कश्मीरी हिंदुओं को इंसाफ नहीं मिला। सही जांच नहीं होने से यासीन मलिक जैसे लोग आजाद हैं। जब सिख दंगों की जांच हो सकती है तो कश्मीर नरसंहार की जांच क्यों नहीं? इसलिए कश्मीरी नरसंहार के केस फिर से खोले जाएं। 1989 से 1990 के बीच हुए नरसंहार की जांच हो। नरसंहार की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया जाए। 32 साल में कश्मीरी पंडितों ने क्या-क्या नहीं सहा? उन्हें अपने घरों से भगाया गया। उन्हें अपनी जमीन से बेदखल किया गया। पंडितों की चुन – चुन कर हत्या की गई। यह सब कहने के साथ ही कश्मीरी पंडितों पर सिस्टम का अत्याचार भी हुआ। पंडितों का पलायन और उनकी हत्याओं की जांच भी सही ढंग से नहीं हो सकी। यह कश्मीर सरकार का ही आंकड़ा है कि 1990 से 1992 के बीच 70,000 हिंदू परिवारों का पलायन हुआ। साल 1990 में 109 हिंदुओं की हत्या हुई। 700 हिंदुओं की हत्या से जुड़े 215 केस की फाइल दोबारा नहीं खुली। सिर्फ 31 आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज हुआ। जिसमें 115 केस अज्ञात आरोपियों के खिलाफ हैं। 147 केस रजिस्टर किए गए। सिर्फ 24 केस में चार्जशीट दाखिल हुई। 2010 में 808 हिंदू फैमिली घाटी में थी। कश्मीर फाइल्स फिल्म आने के बाद जब कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचार का भयानक सच सामने आया, तब यह बात भी उठ रही है कि कश्मीरी पंडितों को भी न्याय मिलना चाहिए। उन पर हुए अत्याचारों के केस फिर से खुलने चाहिए। उनके गुनहगारों को भी सजा मिलनी चाहिए। जम्मू – कश्मीर के पूर्व उपमुख्यमंत्री निर्मल सिंह का कहना है कि सिर्फ 1990 ही नहीं बल्कि 1931 से लेकर पंडितों पर जो भी अत्याचार हुए उनकी जांच होनी चाहिए। हम कहते हैं कि अगर फारूक अब्दुल्ला ईमानदार हैं। अगर उमर अब्दुल्ला चाहते हैं तो इस पूरे मामले की शुरू से जांच होनी चाहिए। कश्मीर फाइल्स के सच को नकारने वाले ऐसे भी नेता है जो यह कह रहे हैं कि सिर्फ कश्मीरी पंडितों के साथ ही नहीं बल्कि अन्य लोगों के साथ भी अत्याचार हुआ है। उनकी भी जांच होनी चाहिए।कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद भी यही कह रहे हैं, परंतु सवाल यह भी है कि यदि गुलाम नबी आजाद अन्य लोगों की भी बात कर रहे हैं कि उनके साथ भी अत्याचार हुआ , तो सवाल यह उठता है कि सिर्फ कश्मीरी पंडितों को ही क्यों झेलना पड़ा? इनके पास इस सवाल का जवाब नहीं है। फिर, क्यों कश्मीरी पंडितों को ही अपना घर और अपनी जमीन छोड़कर कश्मीर छोड़ना पड़ा।

वकील जिंदल ने राष्ट्रपति से की एसआईटी गठन की मांग

फिल्मकार विवेक रंजन अग्निहोत्री ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ नाम से फिल्म बनाई, जिसे पूरे देश में सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। लोग फिल्म में दिखाई चीजों को लेकर बेहद गंभीर दिख रहे हैं। वकील और सामाजिक कार्यकर्ता विनीत जिंदल ने राष्ट्रपति को लिखे अपने पत्र में 1989-1990 में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के मामलों की जांच के लिए उन्हें फिर से खोलने और जांच के लिए एक एसआईटी के गठन की मांग की है। जिंदल ने राष्ट्रपति से आग्रह किया कि एसआईटी को अब तक दर्ज मामलों की पूरी तरह से जांच करनी चाहिए और पीड़ितों को एक मंच प्रदान करना चाहिए जो न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से तत्कालीन प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण अपने मामलों की रिपोर्ट करने में असमर्थ थे. वकील ने तर्क दिया कि यदि 33 साल पहले हुए सिख विरोधी दंगों से संबंधित मामलों को फिर से खोला जा सकता है और फिर से जांच की जा सकती है, तो 27 साल पहले हुए कश्मीरी पंडितों के मामलों को भी फिर से खोला जा सकता है और फिर से जांच की जा सकती है।
जिंदल ने पत्र में कहा कि घटनाओं के शिकार लोग शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक आघात की स्थिति में थे और पिछले कई वर्षों से अपनी आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे थे और वे अपनी शिकायतों को दर्ज कराने, बयान दर्ज कराने की स्थिति में नहीं थे और इसलिए न्याय के अवसर से वंचित है।