न्यायिक अकादमी व इंदौर, ग्वालियर हाईकोर्ट बिल्डिंग का आज शाम शिलान्यास

 

जबलपुर। मध्य प्रदेश राज्य न्यायिक अकादमी के न्यू काम्पलैक्स और हाई कोर्ट की इंदौर व ग्वालियर खंडपीठ के नए कोर्ट भवनों का शिलान्यास समारोह आज रविवार, 19 मई को सायं पांच बजे से मानस भवन सभागार, जबलपुर में आयोजित होगा। ये निर्माण विजन-2047 की मंशा के अनुरूप कराए जा रहे हैं। उक्त जानकारी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल मनोज कुमार श्रीवास्तव ने दी।

मनोज कुमार ने बताया कि कार्यक्रम में हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रवि मलिमठ, हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के प्रशासनिक न्यायाधीश एसए धर्माधिकारी, ग्वालियर बेंच के प्रशासनिक न्यायाधीश विवेक रूसिया, मप्र राज्य न्यायिक अकादमी, जबलपुर के प्रभारी चेयरमैन न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल के अलावा हाई कोर्ट बार एसोसिएशन, जबलपुर के अध्यक्ष अधिवक्ता डीके जैन, हाई कोर्ट बार, इंदौर के अध्यक्ष रितेश इनानी, हाई कोर्ट बार, ग्वालियर के अध्यक्ष पवन पाठक मंचासीन होंगे।

एमपी स्टेट बार ने समारोह से विरत रहने का लिया निर्णय

एमपी स्टेट बार काउंसिल ने मप्र राज्य न्यायिक अकादमी, जबलपुर व हाई कोर्ट की इंदौर-ग्वालियर खंडपीठ में नवीन कोर्ट रूप निर्माण के शिलान्यास समारोह से विरत रहने का निर्णय लिया है। यह कार्यक्रम आज सायं पांच बजे से मानस भवन, जबलपुर में होना है।
स्टेट बार चेयरमैन प्रेम सिंह भदौरिया ने बताया कि कि शनिवार को सामान्य सभा की बैठक में यह मुद्दा उठा। सभी सदस्यों ने सर्वसम्मति से आयोजन से विरत रहने का प्रस्ताव रखा, जिसे स्वीकार कर लिया गया। दरअसल, न्यायिक संस्थान के सबसे महत्वपूर्ण अंग अधिवक्ता हैं। प्रदेश में उनकी सर्वोच्च संस्था स्टेट बार है। इसके बावजूद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने नए निर्माणों व पुननिर्माणों के सिलसिले में न तो स्टेट बार और न ही स्थानीय अधिवक्ता संघों को भरोसे में लिया है। उनसे किसी तरह की चर्चा की जेहमत तक नहीं उठाई गई।

महाधिवक्ता की भी हुई अवहेलना

स्टेट बार चेयरमैन भदौरिया ने जारी बयान में अवगत कराया कि शिलान्यास कार्यक्रम में स्टेट बार ही नहीं मध्य प्रदेश के महाधिवक्ता तक की उपेक्षा की गई है। इससे साफ है कि न्यायिक संस्थान के बड़े वर्ग अधिवक्ता समुदाय के सम्मान व हितों की उपेक्षा करके कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है।

पहले से निर्मित कोर्ट रूमों का नहीं हो पा रहा समुचित उपयोग

स्टेट बार चेयरमैन भदौरिया ने साफ किया कि हाई कोर्ट की मुख्यपीठ जबलुपर व खंडपीठद्वय इंदौर व ग्वालियर में पहले से निर्मित कोर्ट रूमों का समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है। इस तरह इन निर्माणों पर आमजन के धन का अपव्यय स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा है।
आलम यह है कि पहले से स्वीकृत पदों पर जजाें आदि के पदों तक को नहीं भरा जा रहा है। कुल स्वीकृत जजों के पदों के मुकाबले अपेक्षाकृत कम जजों से काम चलाया जा रहा है। मौजूदा कोर्ट रूप खाली पड़े हैं, तो सवाल उठता है कि नए कोर्ट रूम बनाने की क्या आवश्यकता। 2047 के विजन को ध्यान में रखकर किया जा रहा निर्माण कार्य लोकधन की बर्बादी है।