उज्जैन। पूरे प्रदेश के साथ ही उज्जैन में भी बिजली वितरण कंपनी (डिस्कॉम) ने 2026-27 के लिए बिजली की दरों में 10.19 प्रतिशत की बढ़ोतरी का प्रस्ताव दिया है। यह बढ़ोतरी ऐसे समय में आई है जब मप्र में बिजली पहले से ही पड़ोसी राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़ और गुजरात से महंगी है।
दरअसल, प्रदेश की बिजली वितरण कंपनियों ने वर्ष 2014-15 से 2022-23 के बीच के दस साल पुराने बिजली खर्च को उपभोक्ताओं से वसूलने के लिए मध्यप्रदेश विद्युत नियामक आयोग में याचिका दायर की है। इस याचिका में कुल 3,450.63 करोड़ रुपए की वसूली की अनुमति मांगी गई है। यह याचिका एमपी पावर मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड के माध्यम से राज्य की तीनों वितरण कंपनियों-पूर्व, मध्य और पश्चिम डिस्कॉम की ओर से दाखिल की गई है। डिस्कॉम का तर्क है कि यह राशि बिजली बनाने वाली कंपनियों (जनरेटरों) को पहले ही चुकाई जा चुकी है, लेकिन पुराने ट्रू-अप आदेशों में इसे पूरी तरह मंजूरी नहीं मिल पाई थी।
बिजली दरों में यह प्रस्तावित बढ़ोतरी हाल के वर्षों में सबसे बड़ी बढ़ोतरी में से एक है। हालांकि, नियामक आयोग उपभोक्ताओं से सुझाव और आपत्तियां मांगेगा और सार्वजनिक सुनवाई करेगा। इसके बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा। पिछले वर्षों में, आयोग ने डिस्कॉम द्वारा मांगी गई बढ़ोतरी से कम वृद्धि को मंजूरी दी है। अगर यह बढ़ोतरी मंजूर हो जाती है, तो एक सामान्य शहरी मध्यमवर्गीय परिवार, जो एक एसी, फ्रिज, पंखे, लाइट और टीवी का उपयोग करता है और लगभग 400 यूनिट बिजली हर महीने खर्च करता है, उसका मासिक बिल लगभग 3,550 रुपये हो जाएगा। यह वर्तमान बिल से लगभग 300 रुपये अधिक है, यानी सालाना लगभग 3,600 रुपये की बढ़ोतरी। यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हो रही है जब लोगों के घर का बजट पहले से ही तंग है। जिन खर्चों की अब वसूली मांगी जा रही है, वे अनुपूरक (सप्लीमेंट्री) बिजली बिल हैं। ये बिल बिजली उत्पादक कंपनियों ने कई साल बाद भेजे। इनका कारण केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग के संशोधित टैरिफ आदेश, कानून में बदलाव, टैक्स और ड्यूटी में परिवर्तन, आयकर से जुड़े समायोजन और खातों के अंतिम रूप से बंद होने के बाद सामने आए दावे बताए गए हैं। डिस्कॉम्स का कहना है कि ये सभी खर्च ऑडिटेड खातों में दर्ज हैं और वास्तविक हैं। हालांकि, संबंधित वर्षों के ट्रू-अप के दौरान आयोग ने कुछ दावों को यह कहते हुए स्वीकार नहीं किया कि इन्हें अलग से याचिका में लाया जाए। अब उसी आधार पर इन्हें वित्त वर्ष 2024-25 की ट्रू-अप याचिका में शामिल किया गया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि दस साल पुराने खर्चों का बोझ मौजूदा उपभोक्ताओं पर क्यों डाला जाए। उपभोक्ता संगठनों का मानना है कि यदि डिस्कॉम्स समय पर अपने दावे पेश नहीं कर पाए, तो इसकी जिम्मेदारी आम बिजली उपभोक्ताओं पर नहीं डाली जानी चाहिए। इसके अलावा, याचिका में यह भी स्वीकार किया गया है कि पुराने वर्षों का पूरा डेटा नए आईटी सिस्टम में उपलब्ध नहीं है। ऐसे में अधूरे या पुराने रिकॉर्ड के आधार पर इतनी बड़ी राशि की वसूली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।