खुसूर-फुसूर
समाज में सकारात्मकता को बढावा दें…
अंतत: तीन दिन बाद ही सही नीमच जिले के मडावदा पंचायत अंतर्गत रानापुर में आंगनवाडी के बच्चों को मधुमक्खियों से बचाने के दौरान अपनी जान देने वाली कंचनबाई के कर्म को सम्मान मिला है। मुख्यमंत्री ने उनके परिजनों को आर्थिक सहायता एवं बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार ने ली है। इस पूरे मामले में जिला स्तर से हुई यह देरी कदापि भी ठीक नहीं कही जा सकती है। एक महिला के इंसानियत के प्रति कर्त्तव्य और इसके लिए जान के समर्पण के मामले को जिला स्तर पर तर्क-वितर्क के स्तर पर लिया गया और घटनाक्रम को लेकर तमाम तरह के सवालों के जवाब ढूंढे जा रहे हैं। घटना को संदिग्धा स्थिति में देखते हुए पूरे मामले में तीन दिन लगा दिए गए। विचार किजिए की अगर महिला के स्थान पर मधुमक्खियां बच्चों को काटती और कुछ घटनाक्रम होता तो कैसा बवाल मचता। प्रारंभिक स्थिति में तो अधिकारियों की कर्मशीलता पर ही सवाल खडा हो रहा है कि आंगनवाडी ऐसे स्थान पर कैसे चल रही थी जिसके आसपास मधुमक्खियों के छत्ते थे जहां से वे उडी और घटना हुई। अगर मान भी लिया जाए की घटना में कुछ कमी पेशी थी तो भी इंसानियत के प्रति कर्त्तव्य को बढावा देने के लिए सकारात्मकता को अख्तियार कर इसे स्वीकार करते हुए जान देने वाली महिला को सम्मान देना चाहिए था। इस पूरे मामले से कुछ और सवाल भी खडे हो रहे हैं जो सिरे से ही संदिग्ध मामले होते हैं ऐसे मामलों में शासन का मुआवजा देने में अधिकारी देर नहीं करते हैं चाहे बाद में उन मामलों में संबंधित पिडित न्यायालयों में पलट जाते हैं और शासन स्तर से मिलने वाली राशि को खा जाते हैं। अन्यानेक प्रकरणों में विद्वेषपूर्णता के तहत बलात्कार जैसे मामलों में बाद में पिडिता बदल जाती है और ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें अधिकारी जिम्मेदार होते हैं क्या उन मामलों में इतने तर्क वितर्क और संदिग्धा स्थिति के तहत कार्रवाई की जाती है। खुसूर-फुसूर है कि एक और तो केंद्र एवं राज्य सरकारें मानवता के प्रति अपने कर्त्तव्य को जीवंत करने के लिए नकद ईनाम एवं तमाम प्रकार की योजना चला रहे हैं, इसके बाद भी मानवता जीवंत करने में जोर लग रहा है अमूमन प्रति दिन ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिसमें घायल तडफता रहा और लोग देखते रहे । इसके बाद भी कंचनबाई के मामले में इस स्थिति को नकारात्मकता ही कहा जाएगा की तीन दिन तक जिले में इस पूरे मामले को दबाए रखा गया और इस पर तर्क वितर्क एवं तमाम प्रशासनिक तौर तरीका चलता रहा है। ऐसे मामलों में पूरी तरह ध्यान रखा जाना चाहिए कि दुसरों की जान बचाने के लिए कूदने वाला सबूतों को एकजाई करके आगे नहीं बढता वह तत्काल ही कूद पडता है। समाज में सकारात्मकता को बढावा देंने के लिए एवं मानवता के प्रति कर्त्तव्य को जीवंत करने के लिए अपना योगदान दें न कि उसमें तर्क वितर्क किए जाएं। स्वतंत्रता के आंदोलन में अंग्रेजों के दौर में भी यही मानसिकता रही थी इसी कारण से कई स्वातंत्र वीरों के नाम ही हजम कर लिए गए और उसी अनुसार इतिहास लिखा गया जिसे अब उचित तरीकों से ठीक किया जा रहा है। इस स्थिति में इंसानियत के प्रति कर्त्तव्य को बढावा देने के लिए समाज में सकारात्मकता को बढावा दिया जाना चाहिए।