April 15, 2024

इंदौर। बैंक की लापरवाही से एक नेत्र चिकित्सक तीन वर्ष तक परेशान होती रहीं। बैंक ने उनके खाते में ब्याज की गणना ही गलत की थी। अपने खाते का विवरण प्राप्त करने के लिए भी चिकित्सक को 28 बार बैंक के चक्कर काटना पड़े। वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क करने पर करीब 6 माह बाद बैंक ने खाते का विवरण जारी किया। बैंक की लापरवाही के चलते चिकित्सक को घंटों खराब करना पड़े। उन्होंने जिला उपभोक्ता आयोग के समक्ष बैंक के खिलाफ परिवाद दायर किया। आयोग ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद माना कि बैंक ने सेवा में त्रुटि की है। आयोग ने बैंक को आदेश दिया कि नेत्र चिकित्सक को हुए मानसिक संत्रास के एवज में वह उन्हें 20 हजार रुपये का भुगतान करे। आयोग ने बैंक को परिवादी को परिवाद व्यय के रूप में पांच हजार रुपये अतिरिक्त देने का आदेश भी दिया है। यह भुगतान एक माह के भीतर करना होगा। मामला इंदौर निवासी नेत्र चिकित्सक स्मिता मेहता का है। उनका बैंक आफ बडौदा एबी रोड़ शाखा में खाता है। उन्होंने अपने बैंक स्टेटमेंट का ध्यान से अवलोकन किया तो पता चला कि बैंक तीन वर्षों ब्याज की गणना ही गलत कर रहा है। बैंक उनके ओवर ड्यू खाते पर अधिक ब्याज ले रहा था। बैंक की इस आर्थिक अनियमितता की शिकायत चिकित्सक ने बैंक के अधिकारियों से की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। आखिर उन्होंने अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के माध्यम से बैंक के खिलाफ जिला उपभोक्ता आयोग में गुहार लगाई। आयोग ने परिवाद स्वीकारते हुए फैसले में लिखा है कि बैंक ही प्रत्येक खाते के ठीक रखरखाव के लिए बाध्य है। ग्राहक के खाते से वास्तविक ब्याज से अकारण अधिक राशि काटना अनुचित है।