धीरे-धीरे समाप्त हो रही एक माह पूर्व होली का डांडा गाड़ने की प्रथा

ड़नगर। देशभर में होली दहन से एक महीने पहले होली का डंडा रोपने की परंपरा है। ऐसे में उज्जैन जिले के बड़नगर में माघ मास की पूर्णिमा यानी 5 फरवरी को होली का डंडा रोप दिया गया। हालांकि, अब अधिकांश जगह यह डंडा होलिका दहन के एक दिन पहले रोप कर खानापूर्ति की जाती है, जबकि असल में यह डंडा होली से ठीक एक महीने पहले ‘माघ पूर्णिमा’ को रोपा जाता है। होली जैसा महत्वपूर्ण पर्व पहले महीने भर तक मनाया जाता था, अब महज दो दिन का रह गया है।
होली के उत्सव का पहला काम होली का डंडा या डांडा चौराहे पर गाड़ना होता है। होली का डंडा एक प्रकार का पौधा होता है, जिसे सेम, रतन ज्योत का पौधा कहते है। श्री गुजराती रामी माली समाज के राम मंदिर चौराहे पर सैकड़ों वर्ष से होलिका दहन समाज द्वारा किया जाता है। बदलते परिवेश व आधुनिक समय में सब कुछ बदल गया है अब शहर में अधिकांश जगह होली का डंडा होलिका दहन के एक दिन पूर्व ही रोपण कर खानापूर्ति कर दी जाती है लेकिन श्री गुजराती रामी माली समाज द्वारा आज भी पारंपरिक तरीके से होली का डांडा विधि-विधान से पूजा-अर्चन के पश्चात एक माह पूर्व रविवार शाम को गाढ़ा गया।
कब रोपा जाता है डांडा
पं. हितेश बैरागी ने बताया कि माघ शुक्ल पूर्णिमा के दिन होली का डांडा चौराहे पर गाड़ना होता है। इसे भक्त प्रह्लाद का प्रतीक माना जाता है। होली के दिन इसके चारो और छड़ी के ढेर लगा दिए जाते है। महिलाएं दिन में होलिका की पूजा करती है। रात्रि में होलिका दहन कर दिया जाता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा की रात्रि को होलिका दहन किया जाता है होलिका दहन से पहले होली के डांडा को निकाल लिया जाता है।
सामाजिक कार्यकर्ता राजेश मकवाना ने बताया होली से एक माह पहले जगह-जगह होली का डांडा लगाने की प्रथा धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। शहर में अब कई जगह होलिका दहन होती है लेकिन होली का डांडा रोपने की परंपरा नहीं निभाई जाती। केवल होली के एक दिन पूर्व खानापूर्ति के साथ होली का डांडा रोपा जाता है।