सिंहस्थ के निर्माणों को तेज गति से पूर्ण कराने पर ध्यान निर्माण का निरीक्षण ,कामगार की सुरक्षा नजरअंदाज -साईडों पर प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था तक नहीं,संसाधन अभाव में खतरों के बीच काम जारी

 

उज्जैन। सिंहस्थ 2028 के निर्माण कार्यों को तेज गति से पूर्ण कराने के लिए ध्यान दिया जा रहा है लेकिन इस साप्ताहिक निरीक्षण में सिर्फ निर्माण पर ध्यान दिया जा रहा है कारगार की सुरक्षा को नजरअंदाज किया जा रहा है। निर्माण की साईडों पर प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था तक दिखाई नहीं देती है। संसाधन अभाव में खतरों से खेलते हुए ही निर्माण श्रमिक काम कर रहे हैं।

हाल ही में निर्माण की साईडों पर हादसों की शुरूआत हो चुकी है। शांति पैलेस के सामने निर्माणाधीन ब्रिज में झारखंड निवासी एक श्रमिक की सरियों के बीच दब कर मौत हुई है। इस दौरान साफ तौर पर संसाधनों का अभाव सामने रहा है। यहां तक की दबे हुए मजदूर को निकालने के लिए गैस कटर के लिए गैस के सिलेंडर भी मंगवाना पडे और उसके बाद अपरांह् से दबे श्रमिक को कई घंटे बाद निकाला जा सका था। निर्माण के नियमों को ही सीधे तौर पर साईडों पर ताक कर रखकर काम किया जा रहा है लेकिन निरीक्षण में मात्र काम की गति देखी जा रही है निर्माण के नियमों को नहीं । काम करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा को भी सीधे तौर पर ही नजरअंदाज किया जा रहा है।

मोहनपुरा ब्रिज के श्रमिक की मौत-

शनिवार रात को मोहन पुरा ब्रिज निर्माण के काम में लगे पश्चिम बंगाल के श्रमिक राधे पिता विष्णु 32 वर्ष की अचानक तबियत बिगडी थी। उसे अन्य साथी श्रमिक अस्पताल लेकर पहुंचे थे जहां उसकी मौत हो गई। सामने आ रहा है कि साईड पर प्राथमिक चिकित्सा की सुविधा भी नहीं है।

सभी जगह प्राथमिक चिकित्सा का अभाव-

निर्माण के अनुबंधों के प्रारंभिक मांग में ठेकेदार से कार्यस्थल पर प्राथमिक चिकित्सा सुविधा की मांग रखी जाती है। खास यह है कि सिंहस्थ के छोटे से बडे कामों में कहीं भी प्राथमिक चिकित्सा सुविधा कक्ष एवं बाक्स देखने तक को नहीं मिल रहे हैं। बडे ब्रिजों के पास तो ठीक यहां तक की बडे भवनों के निर्माण में भी शहर के मध्य ही इसे दरकिनार किया जा रहा है। निर्माण में लगे मजदूरों को न तो सुरक्षा के उपकरण का उपयोग ही करवाया जा रहा है और न ही उसे जरूरी समझा जा रहा है। अमूमन सामान्य दिनों में काम के दौरान श्रमिक चाहे जैसे काम कर रहे हैं लेकिन साईड के जिम्मेदार विभागीय अधिकारी का इन पर कोई अंकुश नहीं है । अधिकारियों के सामने ठेकेदारों की मनमानी से काम हो रहा है। अधिकारी भी इसे नजरअंदाज कर काम करवाने की प्राथमिकता देख रहे हैं । घाट निर्माण के स्थल पर भी यही हाल हैं तो खान के उपरी हिस्से के काम में भी यही सब देखा जा रहा है। स्थलों पर असुरक्षात्मक रूप से काम करते श्रमिक तो देखे जा सकते हैं लेकिन फर्स्ट एड की सुविधा ढुंढने से भी देखना मुश्किल होता है। शिप्रा को प्रवाहमान बनाने के लिए सेवरखेडी –सिलारखेडी के निर्माणों में भी यही स्थिति ग्रामीण बता रहे हैं।

निरीक्षण के समय नाम मात्र का पालन-

अधिकारियों के निरीक्षण के समय भी अधिकांश स्थलों पर साईड पर श्रमिक ऐसे ही काम करते देखे जा सकते हैं। सिर्फ अधिकारियों के निरीक्षण स्थल के आसपास ही सुरक्षात्मक उपकरण पहनाकर मजदूरों को घुमाया जाता है जिससे की फोटो में सुरक्षात्मक उपकरण के साथ काम करने के साक्ष्य भर रखे जा सकें। इसमें ठेका कंपनी एवं अधिकारियों दोनों के पक्ष के साक्ष्य खडे हो रहे हैं। उसके बाद के शेष समय में श्रमिक बगैर सुरक्षा संसाधन के ही अपने कामों को अंजाम दे रहे हैं,जिसे देखना भी वाजिब नहीं समझा जा रहा है।

एक भी नोटिस नहीं-

इधर सामने आ रहा है कि निर्माण से जुडे विभागों के पास असुरक्षात्मक रूप से काम लेने वाली एजेंसी को नोटिस देने का अधिकार होता है। विभागीय अधिकारी एवं साईड इंजीनियर इसे लेकर अधिकार रखते हैं। उसके बावजूद अब तक एक भी निर्माण ठेका एजेंसी को ऐसा कोई नोटिस देने का और पेनल्टी लगाने का काम नहीं किया गया है। न तो ऐसे किसी मामले में कार्रवाई ही की गई है।

पर्यावरण को ताक में रखकर काम-

सूत्रों के अनुसार निर्माण के कामों में पर्यावरण के नियमों को भी ध्यान में रखकर काम को अंजाम दिया जाना है। जिसमें धूल कण ज्यादा न फैलें इसका भी ध्यान रखते हुए सुरक्षात्मक उपाय किए जाना हैं लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। न तो निर्माण स्थलों को आसपास से नीचे से कवर किया जा रहा है और न हीं उसके आसपास ग्रीन नेट और पानी के छिडकाव का ही उपयोग किया जा रहा है।यहां तक की घाट निर्माण में एनजीटी के नियमों को भी ताक में रखकर काम अंजाम दिया जा रहा है। इससे नदी क्षेत्र के जलीय जीवों का जीवन संकट में ही है।

निर्माण स्थलों पर सूचना पट्ट का अभाव-

निर्माण स्थलों पर सामान्य सूचना पट्ट का अभाव भी देखा जा रहा है जिस पर काम का नाम स्वीकृत राशि, निर्माण की एजेंसी एवं ठेका कंपनी के साथ काम के लिए विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों के नाम एवं नंबर तक ढुंढने से नहीं मिल रहे हैं। निर्माण स्थल के आसपास आमजन को सावधान करने वाले सूचना बोर्ड तक गायब हैं।

 

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