गंदे पानी के प्रबंधन में कभी भी हो सकती है कार्रवाई उज्जैन नगर निगम पर भी लटक रही एनजीटी की तलवार -अधिकारियों का व्यक्तिगत नुकसान भी होगा कार्रवाई में

 

उज्जैन। ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन में लगातार लापरवाही सामने आने पर एनजीटी ने सख्त रूख अपनाया हुआ है। इधर उज्जैन शहर में तरल अपशिष्ट के प्रबंधन की स्थिति को किसी भी हाल में ठीक नहीं कहा जा सकता है। इसके चलते गंदे पानी के प्रबंधन को लेकर कभी भी कार्रवाई संभावित नजर आ रही है। उज्जैन नगर निगम पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है। इसमें संस्थागत रूप से तो कार्रवाई होगी ही अधिकारियों का व्यक्तिगत नुकसान भी होना संभावित बताया जा रहा है। हाल ही में सप्त सागरों को लेकर नगर निगम को ताबडतोड कार्रवाई करना पडी है।

शहर में गंदे नालों का पानी बराबर शिप्रा में बहाया जा रहा है। कुछ समय पूर्व इनमें से कुछ नालों को टाटा कंपनी की पाईप लाईन में जोडते हुए नए बनाए गए सिवरेज ट्रीटमेंट प्लांट सुरासा में जोडा गया है। शहर में घरों से निकलने वाले सिवरेज का अधिकांश हिस्सा अब भी इस लाईन से नहीं जुडा है। शहर में पूर्व में मात्र सदावल में एसटीपी था, टाटा के सिवरेज लाईन डालने के दरमियान ही सुरासा में भी एसटीपी बनाया गया है। इसके बाद भी बराबर नालों में ही सिवरेज जा रहा है और यह कहीं न कहीं नदी में मिल रहा है। इसके चलते तरल अपशिष्ठ की स्थिति में प्रबंधन कमजोर ही पड रहा है। इस मामले में नगर निगम लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के कार्यपालन यंत्री एवं सहायक यंत्री से उनका पक्ष जानने के लिए मोबाईल संपर्क किया गया। कार्यपालन यंत्री नो रिप्लाय होते रहे और सहायक यंत्री का मोबाईल बराबर बंद आता रहा।

सुरासा में 92 एमएलडी का प्लांट-

शहर में पूर्व में सिवरेज वाटर के ट्रीटमेंट के लिए मात्र सदावल में प्लांट था। हाल ही के वर्षों में आगर रोड पर सुरासा के नजदीक एसटीपी बनाया गया है। इसकी क्षमता विभागीय सूत्रों के अनुसार 92 एमएलडी की है। इसमें वर्तमान में 13 में से मात्र कुछ ही नाले जोडे गए हैं जिनमें गऊघाट एवं वाल्मिकी धाम के नजदीक वाला नाला के साथ ही मंगलनाथ के पीछे वाला नाला भी शामिल बताया जा रहा है।

सदावल में 83 एमएलडी का प्लांट-

शहर में सुरासा के पहले से सदावल में एसटीपी बना हुआ है। यह प्लांट 83 एमएलडी का विभागीय सूत्र बता रहे हैं। खास यह है कि सदावल प्लांट मोटरपंप और इलेक्ट्रिक आधार पर होने से आए दिन किसी समस्या के आने पर सिवरेज वाटर सीधे ही नदी में मिल रहा था। कई जगह पर शहर में लाईन डायवर्ट करने से अभी सदावल पर पानी पूरी तरह से नहीं पहुंच रहा है जिससे इस प्लांट का उपयोग बराबर नहीं हो पा रहा है।

मोतीनगर से शुरू है सिवरेज की लाईन-

शहर में टाटा ने सिवरेज के लिए जो लाईन डाली है  वो मोती नगर त्रिवेणी के सामने के हिस्से से शुरू हुई है। इसके विपरित पिछले दस साल में शहर का विकास त्रिवेणी से भी आगे तक पहुंच चुका है और वहां की कालोनियों का सिवरेज पानी पुरी तरह से नालों के माध्यम से सीधे नदी में ही पहुंच रहा है। ऐसे में पूर्व के नदी में मिल रहे 13 नालों में बढोतरी हो गई है और उससे शिप्रा के साथ उज्जैन में आकर कान्ह में भी सिवरेज वाटर मिलने की स्थिति विभागीय सूत्र बता रहे हैं।

चैंबर 25 मीटर गहरे –

टाटा ने सिवरेज के पानी को सुरासा ले जाने के लिए जो मूल लाईन डाली है उसमें शिप्रा के त्रिवेणी मोती नगर से डाउन स्ट्रीम में चेंबर बनाए गए हैं। ऐसे में मोतीनगर के यहां जो 3 मीटर गहराई पर बने नदी किनारे के चेंबर की गहराई मंगलनाथ तक जाते –जाते 25 मीटर के लगभग हो गई है। एसटीपी के पास के इन चेंबरों में कचरा या गंदगी जाम होने की स्थिति में इनकी सफाई करना टेढी खीर साबित होना तय है। 25 मीटर गहरे चेंबर यानिकी करीब तीन मंजिल से अधिक गहराई के इन चेंबरों को साफ करने के लिए मशीनों से ही काम लेना होगा। ऐसे में आगे चलकर यह कठिनाई से भरा ही साबित होना तय है।

एनजीटी का सख्‍त रूख-

हरित क्षेत्रों, जलाशयों के आसपास अवैध रूप से कचरा फेंकने और जलाने के साथ ही पुराने कचरे के निपटारे पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है। एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच ने स्पष्ट किया कि स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है। राज्य सरकार और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है कि वे पर्यावरण की रक्षा करें। इस संबंध में में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का भी हवाला दिया गया। इसके साथ ही निकायों पर नियमों के पालन में विफल रहने पर पर्यावरण जुर्माना भी लगाया गया है जिसमें भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर जैसे दस लाख से अधिक आबादी वाले नगर निगमों को प्रति माह 10 लाख रुपये राशि देनी होगी। पांच लाख रुपये प्रति माह का जुर्माना पांच से दस लाख आबादी वाले निकायों पर लगेगा। एक लाख रुपये प्रति माह अन्य छोटे स्थानीय निकायों के लिए तय की गई है। पांच से दस लाख रुपये प्रति माह का जुर्माना गंदे पानी को सीधे जल निकायों में छोड़ने या सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) न लगाने पर प्रति माह देना होगा। यह जुर्माना प्रति प्लांट या नाला के अनुसार होगा। स्थानीय निकाय जुर्माना भरने में असमर्थ रहते हैं, तो यह राशि राज्य सरकार को देनी होगी। साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों की गोपनीय चरित्रावली (एसीआर) में प्रतिकूल प्रविष्टि (एडवर्स एंट्री) करने के निर्देश भी दिए गए हैं, जिससे उनका प्रमोशन और करियर प्रभावित होगा।एनजीटी ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिए हैं कि उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई करते हुए क्षति की भरपाई कराई जाए और पर्यावरण बहाली के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं। नगर निगम में पर्यावरण सेल गठित कर प्रशिक्षित अधिकारियों की नियुक्ति भी अनिवार्य की गई है।

 

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