खुसूर-फुसूर दिन भर चले अढाई कोस…शहर में यातायात की स्थिति को देखा जाए और पिछले एक माह की मशक्कत

खुसूर-फुसूर

दिन भर चले अढाई कोस…

शहर में यातायात की स्थिति को देखा जाए और पिछले एक माह की मशक्कत को देखा जाए तो विश्लेषण स्तर पर यही कहा जाएगा कि दिन भर चले अढाई कोस के हाल ही कायम हैं। स्लीपर बसें मनाही के बाद भी अंदर आ रही हैं। फटफटिया में माडीफाईड साईलेंसर है तो अन्यानेक वाहन ही माडीफाईड चलाए जा रहे हैं। सिग्नल मात्र दिखावा होकर रह गए हैं। वाहन चालक स्वच्छंद होकर रह गए हैं। न तो वाहन चालकों को वर्दी का डर है और न ही किसी के घायल होने का । अनियंत्रण के हालात सडकों पर देखे जा सकते हैं। पूरे माह भर सबक की कक्षाएं चलाने के बाद भी अगर यही स्थिति है तो उसे पत्थर पर रस्सी घिसने से भी बदतर ही कहा जाएगा। पत्थर पर तो फिर भी निशान रह जाता है लेकिन यहां तो खुद के हाथ पैर टूटने की भी चिंता नहीं है और दुसरे की भी। चौराहों पर ऐसी व्यवस्था है कि चाहे जब सिग्नल की लाईटें बंद हो जा रही हैं। सोलर सिस्टम का सिग्नल कभी चलता है कभी नहीं,अजीब शह है उसकी भी मनमानी निकल पडी है। चौतरफा मार्गों पर मनमानी का आवागमन हो रहा है। ई-चालान मात्र कागज तक ही सिमट कर रह गया है। उस पर स्मार्ट कार्रवाई भी होना चाहिए जो कि देखने में ही नहीं आ रही है। खास तो यह है कि लेफ्ट साईड वाहन चालक की होती है। जिस पर वह चाहे तो आगे बढता रहे और चाहे तो पलट सकता है लेकिन ई-चालान के ऐसे मामले भी सामने आ रहे हैं जिसमें कैमरे ने चालान बना दिया। इंदौर रोड पर महामृत्युंजय द्वार के यहां नानाखेडा से जाते समय अगर वाहन चालक सर्विस लेन पर गया तो उसका भी चालान कट  गया वाह रे स्मार्ट व्यवस्था। खुसूर-फुसूर है कि इससे तो हमारी पुरानी व्यवस्था ज्यादा पुख्ता थी जिसमें एक जवान ही पूरा पाईंट संभाल लेता था और उसका खौफ इतना होता था कि तीन सवारी में से एक पहले ही उतर जाता था और पाईंट से दूर पैदल जाकर वाहन पर बैठता था। वर्तमान में तो बगैर लायसेंस, बगैर परमिट, वालों ने सब प्रकार की व्यवस्था को ठेंगा बता दिया है । यातायात के नियमों को ताक पर रखकर पायलेटिंग हो रही है।

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