खुसूर-फुसूर
बजट पर आम आदमी के साथ कौन
एक बार फिर से देश का बजट सामने आया है। आम आदमी पर रूपए का संकट गहराया है। पक्ष ने बजट को आम जनहितैषी बताया है। विपक्ष ने इसे मध्यमवर्गीय एवं आमजन की कमर तोडने वाला बताया है। रविवार को यही सब देखने सूनने को मिला। शुगर एवं कैंसर की दवा पर दर कम करने की बात भी सूनी और देखी गई। खास बात यह रही कि छोटी मोटी एवं तमाम स्थानीय बातों पर सडकों पर विरोध करने वाला विपक्ष यहां भी विरोध में दिखा लेकिन मात्र शब्दों तक ही यह सीमित रहा है। आमजन की स्थिति भी वैसी ही रही है। विपक्ष का विरोध कहीं भी इसे लेकर सडकों तक सामने नहीं आया है। इसे विरोध की रस्म अदायगी ही कहा जाएगा। बजट पर पक्ष की और से जिला स्तर पर ऐसी बयानबाजी की गई जैसे हथेली में चांद समेटने की स्थिति बन गई हो। पिछली बार भी शुगर एवं कैंसर की दवाएं सस्ती की गई थी फिर दर बढी हुई दवा कैसे बाजार में बिक रही है। दवाईयों के दाम पर नियंत्रण जैसी स्थिति पर प्रश्न खडा हो रहा है। वही ग्लूकोज की बाटल 40 रूपए में मिलती है और उस पर दर कई गूना अंकित होती है। यही बाटल अस्पताल वाले बिल में कुछ और राशि पर जोडते हैं। ये कैसे संभव हो रहा है। ऐसी एक नहीं अनेक बातें हैं जिन पर विपक्ष को अपनी धार तेज करना चाहिए और आमजन के हित में वक्त पर खडा होना चाहिए,जिससे आगामी चुनाव में जनता उन्हें विचार मे रखे। आमजन के साथ आर्थिक मामलों पर विपक्ष का रूख अब तक बहुत ज्यादा स्पष्ट नहीं हुआ है। खुसूर-फुसूर है कि सांप निकल जाने पर लाठी पिटने की परंपरा हमारे यहां पुरानी है। अब नई सोच के साथ सांप निकलने से पूर्व ही तैयारी करने वाली क्रियाशीलता को अपनाना ही जनहित का काम है। इस आर्थिक समय में आमजन को बेजा टैक्स,अत्यधिक दवा दरों, सहित अनेक ऐसे मुद्दे हैं जिन पर बाद में बोलने से कोई फायदा नहीं है ऐसे मामलों में पूर्व से ही विपक्ष को अपने विचार एवं सोच जनहित में उठाना चाहिए।