शिप्रा शुध्दिकरण…इतने गैरजिम्मेदार सरकार के नुमाइंदे..! ठंड से ठिठुरते संतों से एक वादे के लिए लगा दिए छह दिन

ब्रह्मास्त्र उज्जैन। शिप्रा शुद्धिकरण की मांग को लेकर साधु संतों ने 6 दिन तक शीतलहर सही, ठंड में धरना दिया और मिला क्या..? आश्वासन का पुलिंदा..!यदि सिर्फ वादा ही करना था तो इस जनहित के काम में शासन और प्रशासन ने 6 दिन क्यों लगा दिए..?ऐसा तो पहले ही दिन किया जा सकता था। धार्मिक, आध्यात्मिक और मानवता के नाते साधु- संतों को धरने पर इतने दिनों तक बैठे रहने देने की क्या जरूरत थी? लोगों को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि क्या शासन-प्रशासन का दिमाग छठवें दिन चला! जिस जनहित के लिए साधु – संत ठंड में कष्ट सहने को तैयार थे, उसके लिए सरकारी नुमाइंदे इतने अधिक बेफिक्रे रहे कि उन्होंने सिर्फ वादा करने या शिप्रा शुद्धिकरण के इस मुद्दे पर विचार करने के लिए 6 दिन लगा दिए। साधु – संत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को धरना स्थल पर बुलाने की बात कर रहे थे और उनसे लिखित आश्वासन चाहते थे। अभी तो यह भी नहीं कहा जा सकता कि न जाने सरकार के नुमाइंदों ने मुख्यमंत्री तक यह बात पहुंचाई भी है या नहीं ! शिप्रा का शुद्धिकरण होना चाहिए, परंतु यह सिर्फ वादों की फाइल के बीच में दबकर न रह जाए। इसके लिए भी अब साधु-संतों को निरंतर ध्यान रखना पड़ेगा। सरकारी कामकाज किस तरह से चलता है और सरकार के नुमाइंदे उसे कितनी गंभीरता से ले रहे हैं, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

शिप्रा तट पर होने वाले निर्माण के “गंदे” प्रस्ताव को भी रोकना होगा

सरकारी नुमाइंदे अभी सिर्फ तीन तरफ से विचार कर रहे हैं। पहला इंदौर की खान नदी से बहने वाले गंदे पानी को शिप्रा नदी में मिलने से रोकना, देवास की फैक्ट्रियों के गंदे पानी को शिप्रा नदी में नहीं मिलने देना तथा उज्जैन शहर की सीवरेज का पानी शिप्रा में न छोड़ा जाए। यह तो हो गई तीन समस्याएं, जिनका बड़ा हल निकालना बाकी है, लेकिन शिप्रा शुध्दिकरण की दिशा में एक और आने वाली मुसीबत सामने खड़ी हुई है। सांवराखेड़ी की जमीन को आवासीय करने की कोशिश की जा रही है। इसके साथ ही शिप्रा के तट पर होटल- रिसोर्ट की तरह ही नए निर्माण करवाए जाने की कोशिश हो रही है। ध्यान रहे कि यह वह क्षेत्र है जो हर 12 साल में लगने वाले सिंहस्थ मेले के उपयोग में आता है। यदि यहां बसाहट हो गई तो इसका गंदा पानी भी क्षिप्रा में ही मिलेगा। मास्टर प्लान तो तैयार हो चुका है, हालांकि अभी उसकी मंजूरी नहीं हुई है, लेकिन ऐसा “गंदा”प्रस्ताव ही चिंतनीय है।

आश्वासन के बाद धरना स्थगित

गौरतलब है कि गत 8 नवंबर से शिप्रा शुद्धिकरण को लेकर धरने पर बैठे षट् दर्शन साधु समाज का धरना सोमवार को खत्म हो गया। संत रामेश्वर दास ने कहा कि मंत्री और अधिकारियों ने प्लान बताया है। सीएम से मिलने की बात भी कही है। जल्द ही शिप्रा नदी में मिल रहे नाले और कान्ह नदी के गंदे पानी को मिलने से रोकने का आश्वासन हमें दिया है। जिसके बाद हमने धरना स्थगित कर दिया है।

प्लान तैयार, 6 माह में सीवरेज का पानी शिप्रा में नहीं मिलेगा

सरकारी वादे के अनुसार सीवरेज के लिए प्लान तैयार है। अगले 6 माह में उज्जैन शहर के सीवरेज का एक भी बून्द पानी शिप्रा में नहीं मिलेगा। कान्ह नदी के लिए जरूर ठोस प्लान करने की जरूरत है।

मैं अभी भी अन्न नहीं लूंगा, योजना पूरी होने तक केवल फलाहार

मंगलनाथ रोड पर भगवान अंगारेश्वर मंदिर के पास दादू आश्रम के संत ज्ञानदास भी शिप्रा नदी के शुद्धिकरण को लेकर अनशन पर थे। उन्होंने 16 नवम्बर से अन्न त्याग रखा था। मंत्री और अधिकारियों के आश्वासन पर ज्ञानदास महाराज ने अनशन खत्म किया। हालांकि उन्होंने कहा वे योजना पूरी होने तक फलाहार पर ही रहेंगे। अन्न अभी भी ग्रहण नहीं करेंगे। संत ज्ञानदास को कलेक्टर आशीष सिंह ने नारियल पानी पिलाकर अनशन खुलवाया।

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