बात निकली है तो दूर तलक तलक जाएगी: उज्जैन में शासकीय जमीन पर तन रहा निजी हॉस्पिटल, उज्जैन में माफिया की मनमानी

ब्रह्मास्त्र उज्जैन। शहर में एक निजी अस्पताल बनाने जा रहा है। एक बड़ा अस्पताल। लोग बताते हैं कि एमवाय जैसा बड़ा अस्पताल बनाया जा रहा है। बाजार में कुछ सरकारी कागज घूम रहे हैं। एक खसरा नंबर है और खसरे ही से संबंधित अन्य जानकारी। जिस जमीन पर हॉस्पिटल बनने जा रहा हैं, वह जमीन शासकीय है। खसरा नकल में बाकायदा उस जमीन का स्वामित्व शासकीय बताया गया है, मतलब निजी हॉस्पिटल हवा में बन रहा है। भ्रष्टाचार के ताने-बाने से शहर को झूठा सपना दिखाया जा रहा है। जाहिर है जिस हॉस्पिटल की नींव ही भ्रष्टाचार यानी शासकीय जमीन पर कब्जा कर रखी जा रही हो, तो वह भला कहां तक टिकेगा? जो भी हो, यदि यह हॉस्पिटल शासकीय भूमि पर बन रहा है तो जांच का विषय है। नौकरशाही के लिए एक और बड़ा काम है, क्योंकि उन्हें जांच के जरिये यह सुनिश्चित तो इसलिए भी करना होगा क्योंकि वे माफिया के खिलाफ कानूनी जंग छेड़े हुए हैं। ऐसे में अगर उज्जैन का सबसे बड़ा माफिया प्रशासन की नाक के नीचे ही शासकीय भूमि पर निजी अस्पताल तान दे और इसकी खबर भी न लगे, तब तो यह वाकई नौकरशाही की नाक कटने जैसी बात होगी। इसलिए उन्हें सच्चाई का पता तो लगाना ही पड़ेगा। बहरहाल , प्रशासन का विषय है कि वह जांच कब, कैसे और किस स्तर पर कर पाते हैं। लेकिन , भ्रष्टाचार का ताना बाना बुनने वाले सलाखों के पीछे जाना ही चाहिए। शहर में बसें तो खटारा हो रही हैं, वह तो चल नहीं रही हैं और हवाई अड्डे से उड़ान भरने की बात चल रही हैं।
सलाखों के पीछे नजर आएंगे
बाजार में चर्चा तो यह भी है कि शासकीय भूमि पर हॉस्पिटल तानने की कोशिश करने वालों के खिलाफ शिकायत ऊपर तक पहुंचने वाली है। रही बात चुनाव की तो उसमें तो मुद्दा उठना ही है। बहरहाल देखना यह है कि भ्रष्टाचार और कब्जा करके हॉस्पिटल बनाने वाले हॉस्पिटल खोल भी पाते हैं या नहीं, या फिर चुनाव के पहले ही सलाखों के पीछे नजर आएंगे। किसी ने सच ही कहा है, बात निकली है तो दूर तलक जाएगी।

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