चार माह का टैक्स माफी की मांग को लेकर हो सकती है बसों की हड़ताल

सरकार को दी चेतावनी, बसें चली नहीं तो टेक्स कैसा? 280 करोड़ रुपए करो माफ

ब्रह्मास्त्र इंदौर। प्रदेश के बस संचालकों द्वारा सरकार से चार माह का टैक्स माफ करने की मांग को लेकर बस संचालक हड़ताल पर जा सकते हैं। पहले कोरोना के कारण पहिए थमे थे और अब हड़ताल के कारण बसों के पहिए थम सकते हैं। यह मांग 280 करोड़ रुपए माफ करने की है। बस संचालकों ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा है कि बसें नहीं चलने पर भी टैक्स मांगा जा रहा है। अगर इसे माफ नहीं किया जाता है तो बस संचालक अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे।
उल्लेखनीय है कि कोरोना महामारी के चलते सरकार ने 25 मार्च 2020 से बसों के संचालन पर रोक लगा दी थी। इस पर बस संचालकों ने टैक्स माफी की मांग की थी। लॉकडाउन खुलने पर भी जब सरकार ने टैक्स माफ नहीं किया तो बस संचालकों ने बसों का संचालन शुरू नहीं किया। कई दिनों तक चली खींचतान के बाद सरकार ने 165 दिनों का टैक्स माफ किया था और सितंबर से बसों का संचालन शुरू हो सका था, वहीं इस साल एक बार फिर अप्रैल से दूसरा लॉकडाउन लगाया गया था। इस दौरान सरकार ने बसों के संचालन पर रोक नहीं लगाई थी, लेकिन लॉकडाउन के कारण यात्री ना मिलने पर ज्यादातर बसों का संचालन बंद ही रहा।
प्रदेश की 35 हजार बसों का चार माह का टैक्स 280 करोड़ रुपए
प्राइम रूट बस ऑनर्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद शर्मा ने बताया कि प्रदेश में स्टेज कैरेज परमिट (रूट परमिट) लेकर 35 हजार से ज्यादा बसें चलती हैं। एक का औसत एक माह का टैक्स 20 हजार होता है। चार माह लॉकडाउन के कारण बसें बंद होने से एक बस पर टैक्स की राशि 80 हजार होती है। प्रदेश की 35 हजार बसों के हिसाब से यह राशि जोड़ी जाए तो कुल राशि 280 करोड़ होती है। उनका कहना है कि लॉकडान में बसें चलीं ही नहीं तो टैक्स लेने का सरकार को कोई हक नहीं है।
बस संचालकों ने परमिट सरेंडर किए, लेकिन स्वीकारेें नहीं आवेदन
शर्मा ने बताया कि इस दौरान परिवहन विभाग के नियमों के तहत फार्म ‘के’ और ‘ओ’ के माध्यम से बस संचालकों ने अस्थायी तौर पर बसों के परमिट सरेंडर करने के आवेदन भी किए, ताकि उन्हें बेवजह टैक्स ना चुकाना पड़े, लेकिन विभाग ने अप्रैल और मई में तो ऑफिस बंद होने से ये आवेदन स्वीकार नहीं किए और जून में यह कहते हुए आवेदन स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि जून में अप्रैल से परमिट सरेंडर के आवेदन स्वीकार नहीं किए जा सकते। इसके कारण बस संचालकों के प्रयास के बाद भी विभाग ने परमिट वापस नहीं लिए और बसों के चले बिना भी टैक्स थोप दिया।

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