गुंडों के मकान तोड़ने का मामला: किसी को तोड़ा, किसी को छोड़ा

हाई कोर्ट आदेश को भी नहीं माना

मान. चीफ जस्टिस ने खुद की सुनवाई, दो हफ्ते में देना है इंदौर नगर निगम को जवाब

इंदौर। पिछले दिनों गुंडों की आर्थिक कमर तोड़ने के लिए चलाए गए पुलिस और नगर निगम के संयुक्त अभियान के तहत नगर निगम ने कुछ के मकान तोड़ दिए और कुछ के छोड़ दिए। यहां तक कि हाई कोर्ट आदेश के बावजूद मकान नहीं तोड़े गए। इसी मामले को लेकर हाईकोर्ट ने जवाब तलब किया है। इंदौर नगर निगम ने जवाब के लिए 2 हफ्ते का समय मांगा है जो हाईकोर्ट ने दे दिया है। इस पूरे मामले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे खुद माननीय मुख्य न्यायाधीश जस्टिस श्री मोहम्मद रफीक सा. तथा माननीय न्यायाधीश श्री सुजॉय पाल ने सुना है। याचिकाकर्ता आदिल पालवाला की ओर से पैरवी करते हुए सीनियर एडवोकेट श्री हरीश शर्मा तथा एडवोकेट बहादुर सिंह सांखला ने माननीय हाईकोर्ट के समक्ष अपना पक्ष रखा। एड. हरीश शर्मा ने बताया कि हमारा यही कहना है कि नगर निगम ने कुछ लोगों के मकान तोड़ दिए, जबकि कुछ के छोड़ दिए। छोड़े गए मकान में ऐसे भी हैं जिन पर माननीय हाईकोर्ट आदेश दे चुका है। यह भेदभाव नहीं होना चाहिए। सभी के साथ समान न्याय होना चाहिए। लेकिन, कानून को कोई मान ही नहीं रहा। इसी मामले पर इंदौर नगर निगम को जवाब देने के लिए 2 हफ्ते का समय दिया गया है। याचिकाकर्ता आदिल पाल वाला ने बताया कि शेख मुश्ताक जो कि फिलहाल जेल में बंद है ,उसके मकान को तोड़ने का आदेश माननीय हाईकोर्ट कर चुका है। इसके बावजूद नगर निगम ने उसे नहीं तोड़ा। शेख मुश्ताक और उसके परिवार की अवैध व बेनामी अन्य संपत्तियाँ भी बताई जा रही है।

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