अफीम की खेती करने वाला कृषक बना भिखारी

पिपलियामंडी।भारत कृषि प्रधान देश है कुछ प्रदेशों में काला सौना पैदा करने वाले कृषक केंद्र सरकार से अफीम की खेती करने का लाइसेंस प्राप्त कर अफीम का उत्पादन करते हैं इस अफीम से दवाइयां बनती है विदेशी मुद्रा सरकार को प्राप्त होती है कानून कठोर है फसल पैदा करना भी कठिन है पर हमारा कृषक तो इतना मेहनती है कि प्रकृति के प्रकोप पानी की कमी बेमौसम वर्षा ओलावृष्टि, आंधी तूफान , नील गायों का हमला पंछियों का हमला आदि को सहन करने के बाद अपना पसीना बहाकर भी चोरों का सामना करके  अफीम की फसल तैयार करता है परंतु इसके बावजूद भी  हरित क्रांति के सिपाही इन आपदाओ के चलते अफीम फसल के पट्टे को कटने से बचाने की चाह में रिस्क ले लेते है जिसमे सफल नही हो पाते और इस दुख को सुनने वाला कोई नही। जहां केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार कृषि को लाभ का धंधा बनाने के लिए अग्रसर है और योजना भी बना रही है परंतु प्रश्न यह है कि दूसरी और अफीम की नीति बनाने में इतनी देरी क्यों? घोषणाएं हुई है कि अफीम बोने का सही समय निकल गया इसके कारण औसत अफीम पैदा करना मुश्किल हो गया फसल खराब होने से उसको हटवाने नष्ट करवाने के लिए बड़ी जी हजूरी और भ्रष्टाचार करना पड़ रहा है अफीम तोल भी देरी से होता है इससे अफीम की घटती बैठती है कृषक को काफी नुकसान उठाना पड़ता है पट्टे प्राप्त करने से लेकर फसल पैदा करके तोल केंद्र तक कृषक को स्वाभिमान से परे तिरस्कार सहन करना पड़ता है इसलिए कृषक की अफीम फसल का सरकार के माध्यम से फसल बीमा होना चाहिए उपरोक्त कारणों से किसानों की नुकसान का मुआवजा सरकार से मिलना चाहिए समय पर पट्टे मिलना चाहिए समय पर अफीम का तोल होना चाहिए मौसम को देखते हुवे  औसत कम करना चाहिए जिससे पट्टे को बचाया जा सके सभी खाद बिजली मजदूरी आदि महंगाई से अफीम की लागत मूल्य बढ़ गया है इसलिए अफीम की कीमत को बढ़ाया जाना न्यायोचित है

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